Satyajit Ray 100th Birthday Special: उनका सिनेमा न देखा, तो न सूरज देखा, न चांद | Satyajit Ray 100th Birthday Special if you have not watched his cinema so you Neither saw the sun nor the moon noddv | – News in Hindi

Satyajit Ray 100th Birthday Special: किसी को भले ही यह कथन (शीर्षक) अतिश्‍योक्ति भरा लगे, लेकिन सत्‍यजीत रे (Satyajit Ray) की फिल्‍मों के प्रशंसक, दुनिया के सबसे बड़े फिल्‍मकार की इस बात से पूरी तरह इत्‍तेफाक़ रखते हैं. कहावत है, हाथ कंगन को आरसी क्‍या पढ़े-लिखे को फारसी क्‍या ? तो, रे की फिल्‍में देखें और खुद तय करें सच क्‍या है ? अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म जगत में देश का डंका बजाने वाले इस महान फिल्‍मकार का जन्‍म 02 मई 1921 को हुआ था. वैसे हम बता दें रे की फिल्‍मों का संसार अद्भुत, बहुत दिलयस्‍प, विविधता से भरपूर और कौतूहल जगाने वाला संसार है. सत्‍यजीत रे को बेस्‍ट फिल्‍म निर्देशक का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार सबसे ज्‍यादा बार मिला, संभवत: छ: बार. इसलिए हम कह सकते हैं कि वे एक फिल्‍म निर्देशक थे. लेकिन ये आधा सच है.

यूं तो फिल्‍म निर्माण एक टीम वर्क की तरह होता है जिसमें अलग-अलग विषय के विशेषज्ञ अपना काम करते हैं. रे की फिल्‍म रचना इस परिपाटी को नहीं मानती और इस धारणा को ध्‍वस्‍त करती है. उनकी पहचान महज़ एक फिल्‍म निर्देशक के रूप में नहीं है. फिल्‍म तकनीक से जुड़े लगभग सभी प्रमुख कामों में वे दक्ष थे. वे पटकथा लिखते थे, पार्श्‍व संगीत रचते थे. वे कास्‍ट डायरेक्‍टर थे, अपने अभिनेता खुद ढूंढते और कमाल का अभिनय भी कराते. कैमरे के संचालन में वे सिद्धहस्‍त थे, कला-निर्देशन वो खुद करते थे. संपादन टेबल पर उनकी उंगलियां विश्‍वस्‍त अंदाज़ में मूव करती थीं, प्रचार सामग्री की रचना भी वे खुद ही किया करते थे.

हो सकता है आपको लगे उनके बारे में कुछ ज्‍यादा ही बढ़ा चढ़ाकर बात की गई है, लेकिन जब आप अकिरा कुरोसोवा का सत्‍यजीत रे के बारे में कथन सुनेंगे तो इसे कमतर ही मानेंगे. वे कहते हैं- ‘रे का सिनेमा ना देखना इस जगत में सूर्य या चन्‍द्रमा को देखे बिना रहने के समान है.’ जापान के अकीरा कुरोसोवा के जिक्र के बिना दुनिया के फिल्‍म जगत का किस्‍सा पूरा नहीं होता है. वे सिनेमा के सबसे ज्‍यादा प्रतिष्ठित और महत्‍वपूर्ण फिल्‍मकार थे.

बात यहीं खत्‍म नहीं होती सत्‍यजीत रे फिल्‍में बनाने के अलावा और भी अनेक रचनात्‍मक कार्य लगे हाथ निपटाते रहते थे. मसलन वे कहानीकार, गीतकार, पत्रिका संपादक, प्रकाशक और चित्रकार थे, फिल्‍म आलोचक भी. फिल्‍मों के अलावा उन्‍होंने वृत्‍त चित्र भी बनाए. मुहावरे की भाषा में कहें तो कह सकते हैं ‘सत्‍यजीत रे इतने फिल्‍मी थे कि वे इसी को बिछाते थे, इसी को ओढ़ते थे और इसी को पहनते थे. उनकी दुनिया फिल्‍म से शुरू होती थी और फिल्‍म पर ही खत्‍म हो जाती थी.’

फोटो साभार- @Rubaiat_Nahian/Twitter

रोचक तथ्‍य यह है कि उनके केरियर की शुरूआत फिल्‍मों से नहीं हुई. हां वे एक रचनात्‍मक परिवार से संबंध जरूर रखते थे. जब वे तीन साल के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया. उनकी मां ने उन्‍हें मुश्किल से पाला. उन्‍होंने कोलकाता से अर्थशास्‍त्र की डिग्री ली और मां के आग्रह पर रवीन्‍द्र नाथ टैगोर के विश्‍व भारती विश्‍वविद्यालय में भी पढ़े. लेकिन शांतिनिकेतन के बुद्धिजीवी जगत से अप्रभावित रहे.

नौकरी की शुरूआत ब्रिटिश विज्ञापन कंपनी कैमर में जूनियर विज़ुलाइजर के रूप में की. यहां उन्‍हें महीने के सिर्फ अस्‍सी रूपए मिलते थे. जल्‍द ही इसे छोड़कर वे एक प्रेस के साथ काम करने लगे. यहां वे किताबों के मुखपृष्‍ठ बनाया करते थे. इस दौरान उन्‍होंने जिम कार्बेट की Man-eaters of Kumaun तथा जवाहर लाल नेहरू की Discovery of India के मुखपृष्‍ठ बनाए. यहां उनकी मुलाकात विभूति भूषण बंधोपाध्‍याय के प्रसिद्ध बंगला उपन्‍यास ‘पाथेर पांचाली’ से हुई. इसके बाल संस्‍करण पर उन्‍होंने काम किया और बाद में इस पर उन्‍होंने अपनी पहली फीचर फिल्‍म बनाई. इसी की श्रंखला की अगली फिल्‍म अपराजितो थी. बाद में दो फिल्‍में बनाने के बाद उन्‍होंने अपु त्रयी की रचना की और श्रंखला की अंतिम फिल्‍म अपूर संसार बनाई. अपु यानि पाथेर का मुख्‍य पात्र. ‘पाथेर .. ‘ 1955 में रिलीज़ हुई, और अपूर 1959 में बनी.पाथेर पांचाली बहुत मुश्किलों के बाद पूरी हो पाई थी. 1952 में शुरू हुआ छायांकन तीन साल तक चला. जब रे के निर्माण प्रबंधक अनिल चौधरी पैसों का जुगाड़ करते तब फिल्‍म शुरू होती, पैसे खत्‍म होते ही फिल्‍म रूक जाती. जिद्दी रे ने ऐसे पैसों के स्‍त्रोत को ठुकरा दिया जो कथानक में परिवर्तन चाहते थे और उनकी रचना प्रक्रिया में दखल देना चाहते थे. बाद में बंगाल सरकार के ऋण से फिल्‍म पूरी हुई. सत्‍यजीत रे ने सरकार से पैसे तो लिए पर उनके सुझावों को नहीं माना. फिल्‍म को आलोचकों की बहुत अच्‍छी प्रतिक्रिया मिली, छिटपुट आलोचनाएं भी. अपराजितो की सफलता के बाद तो सत्‍यजीत रे के नाम का डंका दुनिया भर में बज गया.

ये तो हुई बड़े लोगों की बातें अब छोटे और सामान्‍यजन की प्रतिक्रिया पर गौर करते हैं. किस्‍सा एक दोस्‍त ओर उसके बेटे से जुड़ा है. जो उसने मुझे घटना के दूसरे दिन सुनाया था. बात पुरानी है उन दिनों अच्‍छी फिल्‍में या तो फिल्‍म समारोहों में देखने को मिलती थीं या दूरदर्शन पर. दूरदर्शन पर सप्‍ताह या दस दिन का एक आयोजन हुआ था जिसमें हर रोज सत्‍यजीत रे की फिल्‍म दिखाई जा रही थीं. फिल्‍म नौ बजे के आसपास शुरू होती थी और विज्ञापनों के कारण देर रात तक खत्‍म होती थी. ऐसी ही एक रात थी. किस्‍सा दोस्‍त के शब्‍दों में – ‘दूरदर्शन पर फिल्‍म शुरू ही होने वाली थी. मेरा बेटा तब सातवीं जमात में पढ़ता था. उन दिनों उसके स्‍कूल के छ:माही एक्‍ज़ाम चल रहे थे. छ:माही एक्‍ज़ाम के अंक फाइनल एक्‍ज़ाम में जुड़ते थे, इसलिए यह एक्‍ज़ाम बच्‍चे के लिए महत्‍वपूर्ण था. पेपर दूसरे दिन सुबह था. वो पास ही बैठकर अपनी पढ़ाई कर रहा था.

नौ बजे सत्‍यजीत रे की फिल्‍म शुरू हुई. फिल्‍म थी ‘गुपी गाईन बाघा बाईन’. फिल्‍म बंगला भाषा में थी. मैं फिल्‍म में डूब गया, बेटे की तरफ मेरा ध्‍यान नहीं था. घंटे भर बाद मैंने पाया कि बेटा पढ़ नहीं रहा है बल्कि पूरी तन्‍मयता से उस भाषा की फिल्‍म देख रहा है जो उसे बिलकुल भी नहीं आती. मैं दंग रह गया, वो फिल्‍म को इतना डूब कर देख रहा था कि मेरी हिम्‍मत नहीं हुई कि उसे फिल्‍म देखने से मना करूं और पढ़ने को कहूं, बावजूद इसके कि सुबह उसका महत्‍वपूर्ण एक्‍ज़ाम था. उसने रात लगभग 12 बजे तक पूरी फिल्‍म देखी.’

Satyajit Ray, Satyajit Ray birthday

तो ये था सत्‍यजीत रे की फिल्‍मों का जादू. ये उनका कमाल ही कहा जाएगा कि एक छोटा सा बच्‍चा जिसे फिल्‍मों की कोई खास समझ नहीं है, वो एक अनजान भाषा की फिल्‍म ना सिर्फ पूरी देखता है बल्कि उसमें डूब जाता है. वैसे रे मसाला फिल्‍में नहीं बनाते लेकिन ‘गुपी ….’ फेंटेसी, एडवेंचर और कॉमेडी फिल्‍म थी. शायद बच्‍चे के देखने के पीछे यह भी वजह हो, लेकिन इससे रे का कमाल कम नहीं होता. बाद में इसके सिक्‍वेल भी बने.
रे की फिल्‍मों को कड़ी आलोचना भी झेलना पड़ी हैं. आलोचकों के अनुसार उनकी फिल्‍में बहुत ही धीमी गति से चलती हैं. रे ने माना कि इसकी गति पर वो कुछ नहीं कर सकते. यहां भी उनके बचाव में उनके खास प्रशंसक कुरोसोवा आते हैं और कहते हैं यह धीमी नहीं बल्कि विशाल नदी की तरह शांति से बहने वाली गति है. उन पर यह भी आरोप लगे कि वो भारत की गरीबी का निर्यात करते हैं.

उनके अंतिम दिनों में बनी फिल्‍में पूर्व की तरह बेहतर नहीं मानी गईं. बीमारी के चलते ये उनकी शैली से अलग तरह गढ़ी गईं थीं. इनमें गणशत्रु, प्रशाखा ओर आगंतुक शामिल थीं. उन्‍होंने लगभग 32 फिल्‍मों का निर्देशन किया. देवी ओर चारूलता उनकी बेहतर फिल्‍मों में शामिल थीं. हिंदी में बनी उनकी फिल्‍म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ को भरपूर प्रशंसा मिली.

फिल्‍म निर्माण की कला उन्‍होंने भले फिल्‍में देखकर सीखीं लेकिन उनकी तकनीकी क्षमता में रत्‍ती भर भी कमी नहीं निकाली जा सकती. कैमरा और लाइट पर उनकी पकड़ बेमिसाल थी. उनकी फिल्‍मों का बजट कम होता था इसलिए वे नेचरल लाइट प्रफर करते थे. वैसे भी रियलिटी पर उनका सर्वाधिक जोर रहता था.

रे को भारत सरकार की ओर से अनेकानेक अवसरों पर पुरस्‍कारों से नवाज़ा गया. आक्‍सफोर्ड विश्‍वविद्यालय ने उन्‍हें मानद उपाधि से सम्‍मानित किया. भारतीय फिल्‍म जगत का सबसे प्रमुख सम्‍मान दादा फाल्‍के उन्‍हें मिला. आस्‍कर में उनकी कोई भी फिल्‍म नामित भले ही ना हुई हो लेकिन 1992 में उन्‍हें आस्‍कर का सबसे सम्‍मानजनक लाईफ टाईम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया. अकादेमी अवार्ड के सदस्‍य इस पुरस्‍कार को देने कोलकाता आए थे, क्‍योंकि रे बीमार थे और अवार्ड लेने जा नहीं सकते थे. सत्‍यजीत रे ने भारतीय फिल्‍मों को अंतर्राष्‍ट्रीय पहचान दिलाई, देश को दुनिया भर में प्रतिष्‍ठा दिलाई. वे भारत के सच्‍चे रत्‍न थे. उन्‍हें ‘भारत रत्‍न’ से नवाज़ा गया, इसके वे सच्‍चे और वास्‍तविक हकदार थे.

ब्लॉगर के बारे में

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.

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