OPINION: महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी के लिए अच्छी खबर है बंगाल में ममता बनर्जी की जीत

(सुजाता आनंदन) नई दिल्ली. वे गोपालक कृष्ण गोखले (Gopal Krishna Gokhale) थे, जिन्होंने कहा था कि ‘जो बंगाल आज सोच रहा है, भारत कल सोचेगा.’ अन्य पीढ़ी के महाराष्ट्रियन पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों का इंतजार कर रहे थे. राज्य के राजनीतिक और सामाजिक समूहों में चर्चा जारी थी कि उनका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि पश्चिम बंगाल में क्या होता है. बीजेपी (BJP) के लिए जीत का मतलब होगा कि महाराष्ट्र (Maharashtra) में सत्तारूढ़ गठबंधन खतरे में है. बीते 18 महीनों से बीजेपी और खासतौर से पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ऐढ़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं. हालांकि, विपक्ष ने कोई भी मौका नहीं छोड़ा, लेकिन ठाकरे और महाविकास अघाड़ी हमेशा भाग्यशाली साबित हुई है. कोविड हालात के चलते केंद्र पर सवाल उठने के बाद भी कई लोगों को लगा कि दूसरी लहर एमवीए सरकार को प्रभावित कर सकती है. एमवीए में कांग्रेस, राकंपा और शिवसेना शामिल हैं. लेकिन इस दौरान दो चीजें हुईं. पहला कि बंगाल ने निर्णायक तौर पर तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री के लिए ममता बनर्जी को चुनाव. साथ ही महाराष्ट्र में कोविड मामलों में गिरावट हुई. ऐसे में बीजेपी के विरोधियों ने राहत की सांस ली और इस बात ने उनकी उस उम्मीद को जिंदा कर दिया है कि ‘लाल-बाल-पाल’ यानि पंजाब, महाराष्ट्र और बंगाल बीजेपी के सामने चुनौती पेश कर सकते हैं.फिलहाल तीनों राज्यों को वही दिग्गज क्षेत्रीय नेता चला रहे हैं, जिन्होंने बीजेपी को हराया था. यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि महाराष्ट्र के नेता- पवार, उद्धव ठाकरे और उनके भाई राज ठाकरे ने बंगाल के जनादेश का स्वागत करने और ममता बनर्जी को बधाई देने में देर नहीं की. इस दौरान भविष्य में भी उनकी मददा का वादा किया गया है. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की (TMC) की जीत से देश भर में विपक्षी ताकतों के संगठित होने की एक संभावना पैदा हो गई है, जिसमें शायद शरद पवार इन अलग-अलग ताकतों को एक साथ लाने में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. कभी एक-दूसरे के एकदम विरोधी रहे कांग्रेस और शिवसेना के साथ आने को देखते हुए यह असंभव सा नहीं लगता है. तब से ही उद्धव ठाकरे ने अपनी पार्टी की सांप्रदायिक बयान बाजी को कम कर दिया है. साथ ही राजनीतिक के साथ धर्म को मिलाने पर महाराष्ट्र विधानसभा में माफी भी मांगी है. इसके अलावा कांग्रेस और शिवसेना औरंगाबाद शहर का नाम संभाजी नगर को बदलने को लेकर एकमत हो गए थे. इस मुद्दे पर जारी विचार को टालने का फैसला किया गया था, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनकी सरकार और गठबंधन खतरे में नहीं आएगी.
विपक्षी ताकतों के एक साथ आने का सपना नया नहीं है. उद्धव और ममता की मुलाकात के अलावा दोनों और कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष के बीच तब काफी सौहार्द देखा गया, जब उन्होंने मेडिकल और इंजीनियरिंग छात्रों के लिए बीते साल अगस्त में सभी विपक्षी मुख्मंत्रियों की वर्चुअल बैठक बुलाई थी. महाराष्ट्र में कांग्रेस नेताओं के एक वर्ग का मानना है कि पश्चिम बंगाल में उनकी पार्टी की हार जानबूझकर हुई थी, क्योंकि राहुल गांधी का मुख्य मकसद भाजपा को हराना था. कुछ वाम समर्थकों ने बीजेपी का साथ देने का फैसला किया था और कुछ कांग्रेसियों ने टीएमसी को चुना. ऐसे में वाम दल के साथ गठबंधन होने की वजह से यह सुनिश्चित हो सका कि आगे वोट बटेंगे नहीं. नतीजा यह हुआ कि यह बीजेपी और टीएमसी के बीच सीधी लड़ाई हो गई. अगर यह सच है, तो पहले ही महाराष्ट्र की एमवीए सरकार की पिछड़ी पंक्ति में खड़ी कांग्रेस 2024 में बीजेपी की हार को सुनिश्चित करने के लिए सभी विकल्पों पर विचार करने के लिए तैयार हो सकती है. बंगाल और इससे पहले महाराष्ट्र में यह साफ हो चुका है कि कांग्रेस के साथ सीधी लड़ाई में बीजेपी बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, लेकिन वह क्षेत्रीय ताकतों के साथ लड़ने में सक्षम नहीं है. कांग्रेस के मामले में यही बात उलट है कि वे एनसीपी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों पर जीत हासिल कर सकती है. पहले से ही कांग्रेस के साथ गठबंधन में शामिल शिवसेना और एनसीपी दोनों के लिए बंगाल के नतीजे प्रोत्साहन के तौर पर आए हैं. सांस्कृतिक तौर पर भी महाराष्ट्र, बंगाल की राह पर चला है. फिर चाहे वह सामाजिक या जातिगत बदलाव हों, बाल विवाह को खत्म करना, विधवा का दोबारा विवाह, लड़कियों और पिछड़ी जातियों की शिक्षा आदि का मुद्दा हो. स्वतंत्रता के समय महाराष्ट्र और बंगाल दोनों देश के सबसे ज्यादा आजाद क्षेत्र थे.

महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ उनका कोविड प्रबंधन एक मजबूत हथियार साबित हो सकता है, लेकिन दूसरे प्रदेशों की तुलना में राज्य के टैस्टिंग और ट्रेसिंग मॉडल ज्यादा प्रभावी है. इसके अलावा प्रशासन ने दूसरी लहर को संभालने के मोर्चे पर भी बेहतर प्रदर्शन किया है. फिर चाहे मुद्दा बिस्तर, ऑक्सीजन या दवा का हो. (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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