Opinion: नक्सल समस्या का समाधान अब ज्यादा दूर नहीं! | – News in Hindi

छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या अंतिम दौर में पहुंच गई है. इस निष्कर्ष पर पहुंचना शायद जल्दबाजी होगी. लेकिन,बीजापुर की घटना के बाद यह मानने वाले लोग कम नहीं हैं कि नक्सली भी अपना वर्चस्व बचाने के लिए आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं. बीजापुर की घटना वर्चस्व के संघर्ष के तौर पर ही देखी जा रही है. सुरक्षाबल के सैकड़ों जवानों की शहादत के बाद राज्य और केंद्र दोनों ही सरकारें अब इस समस्या को काबू में किए बगैर पीछे नहीं हटना चाहतीं. अब यदि सुरक्षा बल एक कदम पीछे हटते हैं तो नक्सली कई कदम आगे बढ़कर हमलावर हो सकते हैं. आदिवासी अंचलों में विकास की आहट भी नक्सलियों के साम्राज्य पर चोट पहुंच रही हैं.

छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार को करना होगा नीति पर पुनर्विचार

वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव के लिए छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने जो वचन पत्र जारी किया था, उसमें नक्सल समस्या का हल बातचीत के जरिए निकालने की बात कही गई थी. यही वो नीति थी,जिसके जरिए नक्सलियों को बीजापुर की घटना को अंजाम देने का मौका मिला. नक्सलियों से बातचीत के आसार चार दशक बाद भी बनते दिखाई नहीं दिए हैं. हथियारों के साथ बातचीत संभव भी नहीं है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नक्सलियों को बातचीत करने का प्रस्ताव दिया था. पहली बार नक्सलियों की ओर से सरकार को जवाब भी मिला. लेकिन जवाब यह था कि वे बातचीत के लिए हथियारों से लैस होकर आएंगे. नक्सलियों की ओर17 मार्च को शांति वार्ता का प्रस्ताव सरकार के सामने रखा था. नक्सलियों ने बयान जारी कर कहा था कि वे जनता की भलाई के लिए छत्तीसगढ़ सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं. उन्होंने बातचीत के लिए तीन शर्तें भी रखी थीं. इनमें सशस्त्र बलों को हटाने, माओवादी संगठनों पर लगे प्रतिबंध हटाने और जेल में बंद उनके नेताओं की बिना शर्त रिहाई शामिल थीं. माना यह जा रहा है कि नक्सलियों ने यह बयान बड़ी घटना को अपनी योजना के अनुसार अंजाम देने के लिए जारी किया था. नक्सली सुरक्षा बल को भ्रमित करना चाहते थे. शायद वे सफल भी रहे.

कांग्रेस गंवा चुकी है अपने जनाधार वाले दर्जनों नेता

नक्सली हमला विपक्ष के लिए सरकार पर हमला बोलने का बड़ा जरिया रही है. वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के दर्जनभर बड़े नेता झीरम घाटी में मारे गए. इसके बाद भी कांग्रेस का नजरिया नक्सलवाद के खिलाफ आक्रामक और गुस्से से भरा नहीं है. लचीला रवैया है. अजित जोगी के नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ की पहली कांग्रेस सरकार ने नक्सल समस्या समाप्त होने का दावा किया गया, लेकिन फिर अचानक समस्या उग्र हो गई. छत्तीसगढ़ के पुलिस प्रशासन में आपसी खींचतान के कारण भी नक्सल समस्या को लेकर सरकार में गंभीरता नहीं दिखाई देती. दस दिन पहले नक्सलियों द्वारा की गई वारदात के भी सरकार ने चेती. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल असम चुनाव में व्यस्त थे. शायद उनकी प्राथमिकता नक्सल समस्या नहीं है.

केन्द्र सरकार समस्या को काबू करना चाहती है. छत्तीसगढ़ की नक्सली समस्या के समाधान की दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार का नजरिया बेहद स्पष्ट है. केन्द्र सरकार हर हाल में नक्सली समस्या खत्म करना चाहती है. गृह मंत्री अमित शाह छत्तीसगढ़ को हर संभव मदद भी लगातार उपलब्ध करा रहे हैं. संभवत: यही कारण है कि भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली राज्य की कांग्रेस सरकार कोई आरोप-प्रत्यारोप केन्द्र सरकार पर नहीं कर रही है.

केंद्रीय सुरक्षा बलों के लगातार बढ़ते दबाव को ही बीजापुर की घटना की मुख्य वजह माना जा रहा है. केंद्रीय गृह मंत्रालय छत्तीसगढ़ के नक्सलवादियों की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए है. गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने कई दौरे भी किए. कई बैठकें भी की. गृह मंत्रालय के आला अधिकारियों का मुख्यालय रायपुर बनाए जाने की अटकलें चल रही थीं. सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव के कारण ही नक्सली सरेंडर भी कर रहे थे. कुछ राज्य की सीमा से बाहर चले गए थे. मध्यप्रदेश के बालाघाट में को ठिकाना बनाने की बाते भी सामने आईं.बघेल सरकार ने नक्सलियों की नीयत को किया अनदेखा

बीजापुर की घटना के बाद यह कहा जा सकता है कि भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने नक्सलियों की नीयत को पहचानने में गलती कर दी है. नक्सलवाद का कथित आंदोलन संगठित अपराधियों के गिरोह के रूप में स्थापित हो चुका है. जल,जंगल जमीन पर कब्जे के अलावा हथियारों के दम पर वसूली करने की घटनाएं बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर में बेहद आम हैं. जो नक्सली दलम छत्तीसगढ़ में बचे हैं, वे अपना वर्चस्व बचाने के लिए आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं. केन्द्र सरकार की स्पष्ट नीति के कारण नक्सलियों का अधिकार क्षेत्र लगातार घटता जा रहा है. नक्सली और भूपेश बघेल सरकार के बीच बैक चैनल बातचीत की कोशिशों की खबरें भी बाहर आईं. इस बातचीत में ही यह संकेत मिले थे कि नक्सली हिंसा छोड़ सकते हैं लेकिन आंदोलन और अपनी विचारधारा को नहीं. बस्तर का आदिवासी इलाका केरल से भी बड़ा है. इस इलाके में नक्सलियों की ही सरकार चलती है. चुनाव में किस दल के उम्मीदवार को जिताना है, यह नक्सली नेता तय करते हैं. केन्द्रीय सुरक्षा बल लगातार नक्सलियों को खदेड़ना का काम कर रहे हैं. यही कारण है कि नक्सली गतिविधियों का केंद्र दंतेवाड़ा और सुकमा में केंद्रित हो गया है. सारे नक्सली इस इलाके में जमा हो चुके हैं.

नक्सलियों की मनोवृति और प्रवृत्ति को किया गया नजर अंदाज

पिछले कुछ सालों में यह ट्रेंड सामने आया है कि नक्सली अप्रैल माह में सामान्यतः बड़ी वारदात को अंजाम देते हैं. नक्सली टेक्निकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन चलाते हैं. इस दौरान एक बड़ी घटना को अंजाम दिया जाता है. सालभर इस घटना का जश्न नक्सली मनाते हैं. कुछ माह पहले सीआरपीएफ का दबाव नक्सलियों पर बहुत ज्यादा था. सुरक्षा बल नक्सली कमांडर माडवी हिडमा की तलाश में जुटे हुए थे. हिडमा का चेहरा आज तक किसी ने नहीं देखा. नक्सली उसे रॉबिनहुड की तरह प्रचारित करते हैं. हिडमा झीरम घाटी की घटना में भी शामिल था. घटना वाले इलाके में हिड़मा के होने की सूचना सुरक्षा बल के पास थी. घटना के बाद यह माना जा रहा है कि हिड़मा के नाम पर सुरक्षा वालों को निशाना बनाने के लिए जाल फेंका गया था. हिडमा यदि सुरक्षा बल के हाथ लग जाता तो नक्सल आंदोलन की जड़े हिल जातीं.

सुरक्षाबल के बुलंद हौसले पड़ रहे हैं भारी
बीजापुर की ताजा घटना सुरक्षा बलों की उत्साहपूर्ण चूक के तौर पर भी देखी जा रही है. जिस इलाके में यह घटना हुई है वहां बीजापुर से सुकमा के बीच रोड बन रही है. नक्सली रोड ब्लॉक करने का काम करते हैं. रोड ओपन पार्टी को पहले नक्सलियों ने निशाना बनाया. नक्सलियों की मौजूदगी की सूचना के बाद सुकमा व बीजापुर जिले के करीब दो हजार जवानों को बड़े ऑपरेशन पर भेजा गया था. तर्रेम से 760 जवानों की टुकड़ी नक्सलियों के एंबुश में फंस गई. दो पहाड़ियों के बीच यू शेप में तीन तरफ से एंबुश लगाए गए थे. पहली ही गोलीबारी में जवानों को नुकसान झेलना पड़ा. शायद भौगोलिक की जानकारी में कोई गफलत सुरक्षा बल के साथ हुई होगी. राज्य को केंद्रीय सुरक्षा बलों से समन्वय बनाना होगा
हर घटना के बाद नक्सलियों के हाथों जवान के मारे जाने के नए-नए कारण सरकार की ओर से दिए जाते हैं. जब नागा बटालियन नक्सलियों से निपटने के लिए भेजी गई तब कहा गया कि वे इस इलाके से वाकिफ नहीं हैं. इस कारण नक्सलियों के हाथों मारे जा रहे हैं. स्थानीय बोली को रुकावट माना गया. सुरक्षाबल में स्थानीय युवकों को भी शामिल किए जाने की पहल की गई.

नक्सली शांति की आड़ में हिंसा फैला रहे हैं. केन्द्रीय सुरक्षा बलों का दबाव जैसे-जैसे बढ़ रहा है,वैसे-वैसे नक्सलियों का इलाके पर वर्चस्व कमजोर होता जा रहा है. दस दिन पहले भी नक्सलियों ने एक बड़ी घटना को अंजाम दिया था. बीजापुर में जवानों की शहादत कई गंभीर संकेत दे रही है. स्थानीय पुलिस प्रशासन में समन्वय की कमी भी लगातार महसूस की जा रही है.

(डिस्क्लेमर- यह लेखक के निजी विचार हैं)

ब्लॉगर के बारे में

दिनेश गुप्ता

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.

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