history of 29 march in andhra pradesh telugu desam party founded by ntr

जब पूरे देश में एक राष्ट्रीय पार्टी (National Party) का वर्चस्व हो गया था और यह एक आम धारणा थी कि न तो कांग्रेस का कोई पुख्ता विकल्प हो सकता है और न ही इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की विकराल छवि और व्यापक लोकप्रियता को चुनौती दी जा सकती है, तब 1982 एक उल्लेखनीय साल के रूप में दर्ज हुआ. इस साल Congress (I) के मज़बूत विकल्प के रूप में तेलुगु देशम पार्टी (TDP) की स्थापना हुई, जिसने जल्द ही यह साबित भी किया कि लोकतांत्रिक राजनीति (Democratic Politics) किसी एक पार्टी की बपौती नहीं है और क्षेत्रीय पार्टियां (Regional Parties) राष्ट्रीय पार्टियों को अच्छा खासा झटका दे सकती हैं.

टीडीपी का उभरना एक बड़ी घटना था क्योंकि यह एक ऐसी क्षेत्रीय पार्टी थी, जो उस वक्त किसी खास क्षेत्रीय मुद्दे की वजह से नहीं उभरी थी, बल्कि यह एक भावपूर्ण बदलावा साबित हुआ और इसने साफ तौर पर पूरे देश को संकेत दिया कि इंदिरा जैसी नेता को भी चैलेंज किया जा सकता था. TDP की स्थापना और उसके क्षेत्रीय वर्चस्व ने पूरे देश में एक सियासी हलचल और प्यास पैदा की, जिससे समाज, आर्थिक और सांस्कृतिक आधारों पर क्षेत्रीय राजनीति बड़ी हुई.

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भाषण देते एनटीआर

साल 1982 भारतीय राजनीति में सोचकर देखिए कि कितना बड़ा बदलाव था कि एक ऐसी पार्टी खड़ी हुई जिसके पीछे कोई राजनीतिक भूमिका नहीं थी, विचारधारा और राजनीतिक चेहरों का कोई परिवार या इतिहास नहीं था. आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के एक पार्टी वाले किले को ढहाने वाली सियासत का आरंभ एक मिसाल बना तो यह भी साबित हुआ कि दक्षिण भारत में सिनेमा के कलाकारों की लोकप्रियता राजनीति में सफलता की कुंजी हो सकती है.

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300 दक्षिणी फिल्मों के लीजेंड एनटी रामाराव राजनीति में एकदम नये थे और उस वक्त भले ही सियासत के खिलाड़ियों ने उन्हें अनाड़ी भी समझ लिया हो, लेकिन उन्होंने बहुत सफाई से फिल्मी ड्रामे की भावुकता को ऐसे हकीकत में उतारा कि वो रुपहले परदे से सच के परदे पर भी कामयाब हो गए.

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तब तक देश में कोई नेता नहीं था, जो इंदिरा गांधी की तरह भीड़ को आकर्षित कर सके, लेकिन यह करिश्मा एनटीआर ने कर दिखाया. इस करिश्मे के पीछे सामाजिक समीकरणों को साधने वाला गणित भी कम महत्वपूर्ण नहीं रहा था. रेड्डी और कम्मा, इन दो अहम समुदायों ने एनटीआर को संतुलन बनाने के लिए पूरा सहयोग दिया, जो कि एनटीआर की सियासी सूझबूझ का उदाहरण भी बना. गौरतलब है कि तब आंध्र की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की चाबी कम्मा समुदाय के हाथ में और उसका समर्थन मिल जाना बड़ी जीत थी.

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एनटीआर, एमजीआर और इंदिरा गांधी की तस्वीर ट्विटर से साभार.

यही नहीं, एनटीआर का जादू ऐसा चला कि आंध्र के पिछड़े समुदायों के लोग भी कांग्रेस का हाथ छोड़कर नई पार्टी के साथ गए और 1983 के चुनाव में इतिहास बन गया. 1978 में जिस कांग्रेस को यहां पिछड़े वर्ग के तीन चौथाई वोट मिले थे, 1983 में 68 फीसदी कम हो गए. 1982-83 की इस क्षेत्रीय सियासत से ‘तेलुगु आत्मसम्मान’ और ‘तेलुगु अपमान’ जैसी भाषा ईजाद भी हुई और राजनीति के कॉपरेटिव संघीय ढांचे की चूलें हिलाने वाली आशा भी.

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टीडीपी के सत्ता में आने के बाद बड़ा बदलाव यह हुआ कि राजनीति में युवा, शिक्षित और प्रोफेशनल चेहरों को भूमिका मिलने से राज्य के साथ ही देश भर में एक ताज़ा लहर महसूस की गई थी. यह भी अहम बात है कि 1982 में बनी पार्टी टीडीपी ने गठबंधन वाली सियासत के सिस्टम को सत्ता में बेहतरीन संतुलन के साथ साधने की तरकीबें भी ईजाद कीं.

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