जानें संक्रांति पर पहली बार कैसे भगवान राम ने उड़ाई थी पतंग फिर क्या हुआ

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माना जाता है कि मकर संक्रांति (Makar Sankranti) पर पहली बार भगवान राम (Lord Rama) ने बचपन में पतंग (Kite) उड़ाई थी, तब से इस त्योहार पर पतंगबाजी की शुरुआत हुई. वैसे पतंगबाजी कई देशों में लोकप्रिय है. मुगल बादशाह और नवाब तो खासतौर पर पतंगबाजी किया करते थे. साइमन कमीशन के विरोध के लिए भी पतंग काफी काम आई.

मकर संक्रांति को पंतग पर्व भी कहा जाता है. मकर संक्रांति के अवसर पर बाजार रंग-बिरंगे पतंगों से सजे नजर आने लगते हैं. आसमान में पतंगे खूब उड़ती हुई दिखती हैं. लेकिन क्या आपको मालूम है कि इस पर्व का पतंगबाजी के साथ क्या रिश्ता है. मकर संक्रांति पर पतंगबाजी का रिश्ता भगवान राम से भी है.

मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने का धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों महत्व हैं. धार्मिक महत्व की बात करें तो इसका संबंध भगवान राम से बताया जाता है. ऐसा माना जाता है भगवान राम ने मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की शुरुआत की थी. तमिल की तन्दनानरामायण के मुताबिक भगवान राम ने जो पतंग उड़ाई वह इन्द्रलोक में चली गई थी. भगवान राम द्वारा शुरू की गई इसी परंपरा को आज भी निभाया जाता है.

वहीं वैज्ञानिक कारण की बात करें तो पतंग उड़ाने का संबंध स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है. क्योंकि पतंग उड़ाने से कई व्यायाम एकसाथ हो जाते हैं. सर्दियों की सुबह पतंग उड़ाने की शरीर को ऊर्जा मिलती है और त्वचा संबंधी विकार दूर होते हैं.

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मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होता है. इस दिन सूर्य मकर रेखा में प्रवेश करता है. बता दें कि जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है तो इसे संक्रांति कहते हैं. एक साल में कुल 12 संक्रांति होती हैं लेकिन इनमें से से मेष, कर्क, तुला और मकर संक्रांति प्रमुख हैं.

रामचरितमानस में बालकांड में उल्लेख
‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास ने ऐसे प्रसंगों का उल्लेख किया है, जब श्रीराम ने अपने भाइयों के साथ पतंग उड़ाई थी. इस संदर्भ में ‘बालकांड’ में उल्लेख मिलता है-

‘राम इक दिन चंग उड़ाई।
इंद्रलोक में पहुँची जाई॥’

एक और रोचक प्रसंग है. पंपापुर से हनुमान को बुलवाया गया था. तब हनुमानजी बाल रूप में थे. जब वे आए, तब ‘मकर संक्रांति’ का पर्व था. श्रीराम भाइयों और मित्र मंडली के साथ पतंग उड़ाने लगे. वह पतंग उड़ते हुए देवलोक तक जा पहुंची.

तुलसीदास ने लिखा है कि जब भगवान राम ने पतंग उड़ाई तो ये इंद्रलोक तक जा पहुंची. जहां इेद्र के बेटे जयंत की पत्नी इस पतंग पर मोहित हो गई.

पतंग को देख कर इंद्र के पुत्र जयंत की पत्नी बहुत आकर्षित हो गई. वह उस पतंग और पतंग उड़ाने वाले के प्रति सोचने लगी-

‘जासु चंग अस सुन्दरताई।
सो पुरुष जग में अधिकाई॥

इस भाव के मन में आते ही उसने तुरंत पतंग पकड़कर अपने पास रख ली. सोचने लगी कि पतंग उड़ाने वाला उसे लेने के लिए जरूर आएगा. जब पतंग दिखाई नहीं दी, तब बालक श्रीराम ने बाल हनुमान को पता लगाने के लिए रवाना किया. पवन पुत्र हनुमान आकाश में उड़ते हुए इंद्रलोक पहुंचे. वहां उन्होंने देखा कि एक स्त्री पतंग को हाथ में पकड़े है.

एक भारतीय पेंटिंग में भगवान कृष्ण पतंग उड़ा रहे हैं.

जब उन्होंने पतंग मांगी तो उस स्त्री ने “यह पतंग किसकी है? ” हनुमानजी ने रामचंद्रजी का नाम बताया. उसने उनके दर्शन की इच्छा प्रकट की. हनुमान ये सुनकर लौट आए. सारी बात श्रीराम से कही. श्रीराम ने हनुमान को वापस वापस भेजा. ये कहलवाया कि वे उन्हें चित्रकूट में अवश्य ही दर्शन देंगे. हनुमान ने ये जवाब जयंत की पत्नी को कह सुनाया, जिसे सुनकर जयंत की पत्नी ने पतंग छोड़ दी. इस पर तुलसीदास ने लिखा-

‘तिन तब सुनत तुरंत ही, दीन्ही छोड़ पतंग।
खेंच लइ प्रभु बेग ही, खेलत बालक संग।’

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इन दो प्रसंगों से पतंग की प्राचीनता का पता चलता है.

हजारों सालों से भारत में उड़ाई जा रही है पतंग
भारत में भी पतंग उड़ाने का शौक़ हजारों वर्ष पुराना है. माना जाता है कि पवित्र लेखों की खोज में लगे चीन के बौद्ध तीर्थयात्रियों द्वारा पतंगबाज़ी का शौक़ भारत पहुंचा.
एक हजार वर्ष साल पहले पतंगों का ज़िक्र संत नाम्बे के गीतों में भी दर्ज है. मुग़ल बादशाहों के शासन काल में तो पतंगों की शान ही निराली थी. खुद बादशाह और शाहज़ादे भी इस खेल को बड़ी ही रुचि से खेला करते थे. तब पतंगों के पेंच लड़ाने की प्रतियोगिताएं भी होती थीं और जीतने वाले को बड़ा इनाम मिलता था.

मुगल बादशाह और नवाब खुद पतंगबाजी के गजब के शौकीन थे. वाजिद अली शाह हर साल पतंगबाजी के लिए खासतौर पर दिल्ली आता था.

बहादुरशाह जफर को बहुत शौक था
मुग़ल सम्राट बहादुरशाह ज़फ़र भी पतंगबाज़ी का बहुत शौकीन था. मुग़लिया दौर के बाद लखनऊ, रामपुर, हैदराबाद आदि शहरों के नवाबों में भी इसका खुमार चढ़ा. ये लोग पतंगों में अशरफियां बांधकर कर उड़ाया करते थे. आखिर में पतंग की डोर तोड़ देते थे, ताकि गांव के लोग पतंग लूट सकें.

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वाजिद अली दिल्ली आते थे पतंगबाजी के लिए
वाजिद अली शाह तो पतंगबाज़ी के लिए हर साल अपनी पतंगबाज़ टोली के साथ पतंगबाज़ी के मुकाबले में दिल्ली आते थे. धीरे-धीरे नवाबों का ये शौक़ आम लोगों की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बनता गया.

तब पतंगों को उड़ाकर साइमन कमीशन का विरोध किया गया
वर्ष 1927 में ‘गो बैक’ वाक्य के साथ लिखी हुई पतंगों को आसमान में उड़ाकर ‘साइमन कमीशन’ का विरोध किया गया था. आजादी की खुशी को जाहिर करने का माध्यम भी पतंग को बनाया गया. बताया जाता है कि 15 अगस्त के दिन दिल्ली में खूब पतंगें उड़ाई गईं थीं.

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