महाराष्‍ट्र विधान परिषद में राज्‍यपाल के कोटे की सीटें को लेकर शिवसेना, कांग्रेस और NCP का संघर्ष

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विधानपरिषद की सीटों के नामांकन के लिए संघर्ष. (Pic- PTI FILE)

धवल कुलकर्णी
महाराष्ट्र की सत्ताधारी महाविकास अघाड़ी के असंतुष्ट नेताओं का हवा देकर विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार को अस्थिर करने की ताक में है. यह ऐसा परिदृश्य है, जिसने सत्तारूढ़ एमवीए (MVA) के घटक दलों यानी शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी को परेशान किए हुए है. ऐसे में इस असंतुष्ट नेताओं को शांत करने के लिए राज्य के मुख्यमंत्री और शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) इन्हें  राज्यपाल के कोटे से विधान परिषद में फिट करने की कोशिश में हैं. इसके साथ ही इन्हें  विभिन्न राज्य-संचालित निगमों में भी नियुक्त करने पर विचार किया जा रहा है. सरकार अगले महीने अपने कार्यकाल का पहला साल पूरा करने जा रही है. ऐसे में वरिष्ठ मंत्रियों का कहना है कि सरकार जल्द ही इन रिक्तियों को भरने की कोशिश में है.

बीजेपी राज्य विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है. उसका दावा है कि यह गठबंधन में विरोधाभासों के सामने आने का समय है और सरकार अपने ही अंतर्विरोधों के कारण गिर जाएगी. निजी बातचीत में बीजेपी नेता दावा करते हैं कि तीनों दलों के असंतुष्ट नेता लगातार दबाव बढ़ा रहे हैं और उनकी पार्टी बस इसके मुखर होने का इंतजार कर रही है, जिससे वह विपक्ष से हटकर ट्रेजरी बेंच में जा सके.

इसलिए MVA के लिए यह जरूरी है कि वह पार्टी नेताओं को अपने पाले में रखने के लिए उन्हें जल्द कोई ओहदा दे ताकि चीज़ें सुधरी रहें. हालांकि, जब राज्यपाल के कोटे से 12 सीटों की बात आती है, तो गठबंधन के नेता स्वीकार करते हैं कि उन्हें अप्रत्याशित प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है. खुद राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के हालिया रुख से भी यही लगता है. शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और कांग्रेस अपने बीच में सीटों के बराबर बंटवारे को लेकर मंथन में जुटी हैं.

यह कहना कि राज्यपाल के साथ एमवीए के संबंध खराब हैं, यह कम बयानी होनी होगी. शिवसेना अब भी बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस के दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दौरान अजित पवार की भूमिका को लेकर अब भी खफा है. हालांकि अजित पवार जल्द ही वापस भी लौट आए, लेकिन शिवसेना और दूसरे घटक दलों के नेताओं की उनसे नाराजगी बरकरार है.

चूंकि उद्धव ठाकरे 28 नवंबर को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद विधायिका के सदस्य नहीं थे. इसलिए उन्हें 27 मई तक सदन के लिए चुना जाना था, जिसमें विफल होने पर उन्हें इस्तीफा देना पड़ सकता था. कोरोना महामारी ने विधान परिषद की नौ सीटों के लिए चुनावों को स्थगित कर दिया था और मंत्रिमंडल ने सिफारिश की थी कि उद्धव को राज्यपाल के कोटे में दो सीटों में से एक से उच्च सदन के लिए नामित किया जाए, जो तब खाली थी.

लेकिन राज्‍यपाल भगत सिंह कोशियारी ने तकनीकी आधार पर काम किया. चुनाव आयोग (ECI) ने आखिरकार उन चुनावों की घोषणा की जो निर्विरोध हुए, इस तरह संवैधानिक संकट पैदा हो गया. अब एमवीए गठबंधन के नेता इस स्थिति को दोहराने से डरते हैं अगर राज्यपाल जून की शुरुआत में खाली हुई 12 सीटों के लिए अपनी सिफारिशों को ठुकराने के लिए प्रावधानों की किताबों की व्याख्या पर जाने पर जोर देते हैं. दूसरी चिंता यह है कि मंत्रिमंडल की सिफारिश के बावजूद राज्यपाल जल्दबाजी में निर्णय नहीं ले सकते.

संविधान का अनुच्छेद 171 (5) यह बताता है कि राज्यपाल द्वारा नामित किए जाने वाले सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और सामाजिक सेवा में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले होंगे. हालांकि इस प्रावधान का उल्लंघन राजनीतिक व्‍यक्तियों को समायोजित करने के लिए कई बार किया गया है. जीए डी मादगुलकर, शांताराम नंदगांवकर, एनएडीओ मनोहर और रामदास फुताने व एमजी वैद्य जैसे पत्रकारों जैसे कुछ कवि और लेखक अभी तक इस कोटा से राज्य विधान परिषद के सदस्य हैं.

शिवसेना के मंत्री के रूप में मानने पर समस्या यह है कि ये प्रावधान अस्पष्ट हैं और व्याख्या के अधीन हैं. उदाहरण के लिए क्या कोई राजनीतिक नेता या कार्यकर्ता जो रक्तदान शिविरों का आयोजन करता है, को सामाजिक सेवा में एक पृष्ठभूमि के रूप में माना जाता है और इसलिए इस रास्‍ते के माध्यम से विधान परिषद में नियुक्ति के लिए पात्र हो सकता है?

राजभवन एक समानांतर सत्ता केंद्र है. साथ ही एमवीए के लिए प्रतिकूल है. उदाहरण के लिए एक्‍ट्रेस कंगना रनौत जब सुशांत सिंह राजपूत मामले को लेकर शिवसेना के साथ लड़ाई में उलझीं और बीएमसी द्वारा उनके ऑफिस को ध्वस्त किया गया तो वह पिछले महीने राज्‍यपाल कोश्‍यारी से मिलीं. उन्‍होंने कहा कि राज्‍यपाल ने उनकी बात अपनी बेटी की तरह ही सुनी.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि राज्‍यपाल कोश्‍यारी ने सीएम उद्धव को लिखे गए अपने पत्र में मंदिरों और पूजा स्थलों को फिर से खोलने के लिए अपने शब्दों को बेहतर तरीके से चुना है, जो महामारी के कारण बंद हो गए हैं. कोश्‍यारी ने सवाल किया था कि अगर उद्धव ‘धर्मनिरपेक्ष बने’ तो.

विधान परिषद के ये नामांकन शिवसेना के लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं जो अपने वफादारों को समायोजित करना चाहती है. पार्टी में जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में बेचैनी है, ताकत से बाहर होने के कारण शिवसेना को अपने कोटे से मंत्रियों की परिषद में निर्दलीय और छोटे दलों को समायोजित करने के लिए मजबूर किया जा रहा है. पार्टी से वफादारों को नामांकित करने से इस असंतुष्टता को दूर करने में मदद मिलेगी. कांग्रेस को भी उम्मीद है कि वह इन नामांकन का इस्तेमाल युद्धरत गुटों के हितों को अपने पाले में करने के लिए करेगी.

ऐसी खबरें हैं कि एनसीपी उत्तर महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ बीजेपी नेता के नाम पर काम कर रही है, जिन्हें इस कोटे से परिषद में भेजा जा सकता है. बाद में उन्हें मंत्री पद दिया जा सकता है. एनसीपी किसान नेता और पूर्व लोकसभा सांसद राजू शेट्टी के साथ साथ चुनाव करने के लिए भी उत्सुक है. उनका गन्ना और डेयरी किसानों में मजबूत आधार है.

एनसीपी और शिवसेना की कैबिनेट में कुछ विभागों की अदला-बदली की संभावना है. उच्च सदन के लिए नामांकन के माध्यम से एमवीए राज्य-संचालित निगमों के लिए नियुक्तियों को पूरा करने की योजना बना रहा है. इनमें शहर और औद्योगिक विकास निगम (सिडको), महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी), और महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (म्हाडा) जैसे नकद-समृद्ध निकाय शामिल हैं. लेकिन, एमवीए के नेताओं के रूप में यह प्रक्रिया, परिषद के नामांकन के दौरान राज्यपाल की स्थिति पर निर्भर है. (यह लेखक के निजी विचार हैं. लेखक मुंबई में पत्रकार हैं. साथ ही ‘द कजिन्‍स ठाकरे: उद्धव, राज एंड द शैडो ऑफ देयर सेनाज’ पुस्‍तक के लेखक है.’)

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