मैं भी हूं न! | – News in Hindi

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मैं भी हूं न!

करीब डेढ़ साल पहले एक अंग्रेजी फिल्म देखी थी जिसका नाम था, ‘हिडेन फिगर्स’. यह कहानी अमरीका की उन गुमनाम अश्वेत महिलाओं की कहानी थी जिन्होंने कभी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नासा के लिए काम किया था. इस फिल्म का ट्रीटमेंट, कथानक, विषय उस समय बहुत याद आया था, जब हम ‘मिशन मंगल’ देख रहे थे. लेकिन हाल ही में आई एक और हिंदी फिल्म ‘गुंजन सक्सेना’ के बारे में जब विवाद हुआ, तो उसे सुनकर एक बार फिर इस फिल्म की याद ताज़ा हो गई. लगा 1960 का विश्व, 1990 का भारत, 2020 का हमारा समाज, बहुत बदला है पर शायद अभी भी पूरा बदलना उसका बाकी है. यह बदलाव नजरिए का है, औरतों के प्रति नज़रिए का. और नज़रिया जाते जाते ही जाता है.

‘नासा की ह्यूमन कंप्यूटर्स’
कैथरीन जॉनसन, डोरोथी वॉन, मैरी जैक्सन वो एफ्रो-अमेरिकन मैथमटिशियन थीं जिन्हें नासा में हर कोई ‘ह्यूमन कंप्यूटर’ के नाम से जानता था. वो बात और है कि नासा के बाहर उन्हें कोई नहीं जानता था. यही नहीं, उन्हें अपने श्वेत सहकर्मियों के बनिस्बत, सहूलियतें और क्रेडिट, दोनों कम मिलते थे. रंगभेद के कारण ‘कलर्ड कैफेटेरिया’ और ‘कलर्ड वाशरूम’ तक ही सीमित रहने वाली इन महिलाओं ने कैसे अपने लिए अंतरिक्ष अभियान से जुड़ी महत्वपूर्ण मीटिंगस में शिरकत करने का रास्ता तय किया, बेसिक सुविधाओं से वंचित रह के भी अपनी पूरी कार्यकुशलता के साथ कैसे,’अमेरिकन सपने’ को कामयाब बनाने में अपना भरपूर योगदान दिया. अंतरिक्षयात्रियों का रास्ता आसान करने वाली इन अश्वेत महिलाओं का अपना bio break का वाशरूम तक का सफ़र कितना कठिनाइयों भरा था, ये सब दिखाने में फ़िल्म ‘हिडेन फ़िगर्स’ अपने लक्ष्य में पूरी तरह से कामयाब हुई.

फ़िल्म का एक दृश्य काफ़ी प्रभावशाली है जहां संभावित स्पेस मिशन पर बंद दरवाज़े में एक मीटिंग होने वाली है. मीटिंग में शिरकत करने जा रही कैथरीन जॉनसन को रोकते हुए नासा इंजीनियर पॉल स्टैफ़ोर्ड कहते हैं, “ऐसा कोई नियम नहीं है कि औरतें भी मीटिंग में आएंगी” जिसको सुन कैथरीन तपाक से कहती हैं, “नियम तो आदमी के अंतरिक्ष में जाने के भी नहीं हैं”. यानि जो अमरीकी संस्था जॉन ग्लेन को उस समय अंतरिक्ष भेजने की तैयारी कर रही थी उस संस्था को अपने ही भीतर अभी कितना बदलाव लाना बाकी था. और ये 1960 का अमरीका था.

यहां कह सकते हैं कि1960s में इन अश्वेत महिलाओं को इतनी सम्मानित विख्यात संस्था में काम करने का मौका मिला, इनके पास कॉलेज डिग्री भी थी. ये कितनी blessed थीं. पर सच्चाई का दूसरा पहलू भी था. फ़िल्म में जब मैरी जैक्सन से पूछा जाता है कि “अगर वो श्वेत मर्द होती तो क्या तब भी इंजीनियर बनने का ख्वाब देखतीं”? जवाब में मैरी कहती हैं,”तब तो अभी तक मैं इंजीनियर बन भी चुकी होती”. इस तरह मैरी को कोर्ट के आदेश से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने का मौका मिलता है.

2020 में हम शायद उस वक़्त की सच्चाई को आज के नज़रिए से देखते हैं. चाहे अमरीका हो, चाहे हिंदुस्तान. इसलिए बहुत सी बातें हैं जो हमें आज के हिसाब से हज़म नहीं होतीं. लेकिन वो उस समय की ‘रियलिटी’, उस समय का सच होती हैं.

इतिहासदरअसल द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलीन रुजवेल्ट, एक अधिनियम (Exec order 8802)निकालते हैं, जिसके जरिए वह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महकमों और सरकारी नौकरियों में रंग, नस्ल, राष्ट्रीयता से जुड़े भेदों को हटा देते हैं. हालांकि इसमें जेंडर तब भी शामिल नहीं था. पर इस अधिनियम के आने के 6 महीने बाद, यानी पर्ल हार्बर अटैक के बाद NACA(1958 में इस एजेंसी को भंग कर NASA कर दिया गया था) में उन एफ्रो अमेरिकी महिलाओं की भर्ती होती है जिनके पास कॉलेज की डिग्री है और जो कैलकुलेशंस में अच्छी हैं. इन्हें मानव कंप्यूटर की तरह काम करना होता था. इनकी जॉब डिक्रिप्शन ही ‘ह्यूमन कंप्यूटर’ थी. हालांकि इनका काम अपने श्वेत सहकर्मियों के जितना ही था, पर इन्हें कम सहूलियतें मिलती थीं, और रंग भेद की प्रताड़ना का भी सामना करना पड़ता था.

बायोपिक्स और हिस्टोरिकल्स
दरअसल, सत्य कथाओं पे आधारित फिल्मों में सौ प्रतिशत सत्यता ही हो, ऐसा ज़रूरी नहीं है. फिल्मकार अक्सर अपने विषय के साथ ‘क्रिएटिव लिबर्टीज’ लेते हैं. ये सब पटकथा में रोचकता बनाये रखने के लिए किया जाता है. कई बार ऐसा भी लगता है कि फ़िल्म में दिखाई जाने वाली सारी दिक्कतें, एक ही इंसान के साथ कैसे आ सकती हैं? अक्सर फिल्मकार एक ही कहानी में कई मुद्दे उठा लेते हैं, जो नायक नायिका के साथ हो सकता है, न घटा हो. लेकिन समाज में किसी और के साथ हो सकता है, घटा हो. एक फ़िल्म में कई कहानियां तो कही नहीं जा सकतीं. इसलिए निर्देशक अक्सर, मल्टीपल लोगों की कहानियां एक ही किरदार के ज़रिए कहने की कोशिश करते हैं. अब बात गुंजन सक्सेना की भी करते हैं…

क्रिएटिव लिबर्टीज
कहा जा रहा है कि गुंजन सक्सेना पे बनी फिल्म में IAF को गलत तरीके से दिखाया गया है. कई अतिउत्साही देशभक्त, इस फ़िल्म को देशद्रोह की श्रेणी में भी डाल रहे हैं. यही खबरें पढ़ पढ़ के मेरे मन में अनेक सवाल आने लगे. लगा कि क्या अमरीका में नासा की पृष्ठभूमि में बनी ‘हिडेन फ़िगर्स’ को भी इसी दृष्टि से देखा गया था? क्या हमारे समाज में पहली महिला पुलिस अधिकारी का सफर इन दिक्कतों से परे रहा है? क्या आज की महिला पुलिस/फौजी अधिकारियों को कोई दिक्कतें नहीं हैं? अगर वो उन दिक्कतों के बारे में बोलेंगी तो क्या संस्था के ख़िलाफ़ गद्दारी होगी? क्या उनके बोलने को हम सुधारों से नहीं जोड़ सकते? क्या हमारी संस्थाएं इतनी कमज़ोर हैं कि एक कहानी के बोझ से टूट जाएंगी? क्या हम इन फिल्मों को संस्था की कमज़ोरी से नहीं, महिला सशक्तिकरण से जोड़ के नहीं देख सकते?

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इन प्रश्नों का जवाब मेरा बावरा मन तलाशता रहेगा. बहरहाल इतना ही कहूंगी, महिला होना ही एक ‘स्ट्रगल’ है. ऊपर से वर्किंग वुमन होना, अपने आप में एक यात्रा है. हर पक्ष को संभालते हुए क़दम बढ़ाना, और कामयाब हो पाना, उस से भी बड़ी जंग है. और यकीन मानिए, इस जंग का फिल्मों में हमें सिर्फ प्रतीकात्मक रूप ही देखने को मिलता है.

अंत में हिडन फ़िगर्स के ही एक अति महत्वपूर्ण सीन की याद दिलाना चाहूंगी. ये वाकया हो सकता है असल ज़िंदगी में न हुआ हो, पर फ़िल्म के ज़रिए इसका प्रतीकात्मक संदेस देना निर्देशक के लिए बहुत ज़रूरी था. फ़िल्म के एक सीन में कैथरीन के बॉस ‘हैरिसन'(केविन कॉस्टनेर ने इस रोल को निभाया था)को जब मालूम चलता है कि कैथरीन को ‘Coloured washroom’ के लिए 800 मीटर का सफर तय करना पड़ता है तो उन्हें बहुत गुस्सा आता है. गुस्से में वो खुद वाशरूम तक का सफर तय करते हैं, और उस ‘साइनबोर्ड’ को औजार की मदद से तोड़ देते हैं. हैरिसन, महत्वपूर्ण मीटिंग्स में, कैथरीन की मौजूदगी सुनिश्चित करवाते हैं. जॉन ग्लेंन स्वयं कैथरीन पर किसी भी और मशीन या इंसान से ज़्यादा भरोसा रखते हैं.

कुल मिला के एक सक्षम मर्द ही महिला का सशक्त रूप देख सकता है, इसलिए औरतों के सशक्तिकरण से ज़्यादा मर्दों के सशक्त नज़रिए के लिए काम करना ज़रूरी है. समाज में सिर्फ एक सशक्त मर्द ही औरत को ‘मैं भी हूं न’ का स्पेस दे सकता है.

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