भारत को मैकाले से मुक्ति दिलाएगी शिक्षा नीति-2020 | – News in Hindi

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भारत को मैकाले से मुक्ति दिलाएगी शिक्षा नीति-2020

भारत की युवा पीढ़ी को दी जा रही शिक्षा की कमियों पर चर्चा गांव-देहात की चौपालों से लेकर दिल्ली के प्रबुद्ध-जनों के अड्डों तक लगातार होती रहती है. 1974 में प्रोफेसर बनाने के बाद मुझे हर स्तर पर चर्चाओं में भाग लेने, सुनने और सुनाने के अवसर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार मिलते रहे हैं. यदि मैं एक नाम लेना चाहूं, जिस पर सबसे अधिक आरोप और आक्षेप लगभग हर चर्चा में लगाए जाते रहे तो वह होगा थॉमस बैबिंगटन मैकाले! 1835 के मैकाले के मिनट्स मुझे लगभग लोगों नें याद करा दिए थे. भारत में ब्रिटिश राज की जड़ें जमाने में मैकाले का अद्वितीय योगदान रहा. उसके द्वारा भारत में जिस रोपित शिक्षा व्यवस्था को लागू किया गया उसमें भारत की परंपरागत ज्ञानार्जन परंपरा के विलुप्त करने के सभी तत्व मौजूद थे. गुरुकुल और मदरसे बंद कर दिए गए. फारसी सरकारी कामकाज की भाषा हटा दी गई.

अंग्रेजों के पहले देश में साक्षरता काफी ज्यादा थी.  मैकाले राजनयिक था, नौकरशाह था, वह अप्रतिम रूप में  सामंती संस्कृति का रणनीतिकार था. मैकाले ने एक पत्र में लिखा था. उसका उद्देश्य एक वाक्य में यूं वर्णित होता है: भारत पर आधिपत्य बनाए रखने के लिए भारतीयों को भारत से अलग करना होगा! वह इसमें पूरी तरह सफल रहा. भारत के लोग अपनी संस्कृति, विरासत ज्ञानार्जन परंपरा, इतिहास तथा सामुदायिक गौरव भूल गए, वे केवल पश्चिम की करने मात्र के लायक रह गए. मैकाले ने अपने देश और साम्राज्यवादियों की नैतिकता के अनुसार भारत को हर प्रकार से ध्वस्त करने के लिए शिक्षा का सहारा लिया. वह अपने उद्देश्य में अपेक्षा से अधिक सफल रहा. सात दशकों तक उसके  प्रभाव से यदि हम मुक्त नहीं हो सके, तो उसके जिम्मेवारी हमारी है, न कि मैकाले की. उसकी सराहना करनी चाहिए कि यह उसकी चतुराई भरी रणनीति थी जिस के कारण आज भी करोड़ों भारतीय अपने बच्चों को पहले दिन से ही अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने के लिए लालायित रहते हैं, अपनी अन्य जरूरतों में हर प्रकार की कमी कर निजी स्कूलों में मोटी- मोटी फीस देते हैं.

1968, 1986/92 के बाद 2020 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित हुई है. किसी भी शिक्षा नीति की उपयोगिता उसकी गतिशीलता और उसमें निहित वे तत्व होते हैं जो समाज की  उभरती और परिवर्तित होती आशाओं और अपेक्षाओं की कसौटी पर खरे उतरते हों. भारत की पहली आवश्यकता है युवाओं में आत्मविश्वास जागृत करना. उसके लिए हर स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ानी पड़ेगी और 3-6 वर्ष की आयु के बच्चों की और विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा. जिन बच्चों को एकाएक 6 वर्ष की आयु में स्कूल भेजा जाता था, वे उनसे पिछड़ जाते थे जिन्हें केजी, प्री- नर्सरी, नर्सरी जैसी सुविधाएं उपलब्ध हो जाती थी. 3-6 आयु-वर्ग के लिए प्रबंधन करना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी मगर यह कार्य तो बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था. यदि इन बच्चों को आवश्यक सुविधाएं मिल सकीं, और इनके अध्यापकों को समुचित प्रशिक्षण दिया जा सका, तो इन पहले तीन वर्षों में बच्चों की अभिरुचियों का विकास निर्बाध रूप से संभव होगा, और अध्यापकों के पास उसे पहचानने का अवसर उपलब्ध होगा. यदि इन अध्यापकों को प्रशिक्षण के साथ यह प्रेरणा भी आत्मसात कराई जा सके कि वे ही वास्तव में भारत के भविष्य के निर्माता हैं, वे इन बच्चों का जीवन संवार रहे हैं, वे उन्हें भारत से जोड़ रहे हैं, तो भारत के स्कूलों का सारा वातावरण ही बदल जाएगा.

नई शिक्षा नीति में इस परिवर्तन की पूरी संभावना निहित है. यदि बच्चे का क्षितिज पूर्व-प्राप्त जानकारी से अधिक जानकारी; परिचित से अपरिचित की ओर; के आधार पर बढ़ने दिया जाय, तो उसकी जिज्ञासा और  सर्जनात्मकता स्वतः ही प्रस्फुटित होती जाएगी. जैसे जैसे वह आगे बढेगा, यही आधार उसे नवाचार और शोध के लिए तैयार करेगा. हाथ से काम करने का प्रभाव चरित्र विकास पर पड़ेगा, साथ साथ मिलकर सर्जन करने से सामूहिकता और सामाजिकता बढ़ेगी. व्यावसायिक शिक्षा का कक्षा छह से प्रारम्भ हो जाने से गांधी जी की वह संकल्पना साकार कर सकेगी, जिसमें वह चाहते थे कि बच्चे के मन, मष्तिष्क और हाथ का सम्पूर्ण और समेकित विकास हो. जब कोई बच्चा दस दिन किसी कामगार के साथ ‘बैग लेस इंटर्नशिप’ करेगा, तो उसकी सामाजिकता विस्तृत होगी. यह एक जुडाव का अत्यंत प्रभावशाली नवचार हो सकता है.

नई शिक्षा नीति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष वह स्मरण है जो भारत की ज्ञानार्जन परंपरा को प्राचीन समय से ही अन्य सभी से  विशिष्ट बनाता रहा है: चरित्र निर्माण! इसमें व्यक्ति स्वयं अपने से सामंजस्य स्थापित करता है, अन्य के प्रति मानवीय दृष्टिकोण विकसित करता है, और मनुष्य तथा प्रकृति के संवेदनशील संबंधों के निर्वाह में अपने उत्तरदायित्व को समझ कर तदनुसार कार्य करता है. नई शिक्षा नीति का पहला वाक्य स्वीकार करता है कि मनुष्य की सम्पूर्ण क्षमता के विकास का मूल आधार शिक्षा है. जो राष्ट्र इस क्षमता को उद्घाटित करने में जितना सफल होगा, वह उतनी ही प्रगति कर सकेगा. ज्ञानार्जन और ज्ञान की खोज तथा उसके उपयोग की निरंतरता को सम्मानपूर्वक स्थापित करते हुए यह नीति  चरक, सुश्रुत, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, माधव, चाणक्य, पतंजलि, पाणिनि जैसे मनीषियों के योगदान का स्मरण कराती है और युवा पीढ़ी को बड़े लक्ष्य तय करने और उन तक सफलतापूर्वक पहुंचने के लिए प्रेरित करती है.

भारत का गणित, योग, अंतरिक्ष-ज्ञान, धातु-विज्ञान, कला, आर्किटेक्चर, आयुर्वेद जैसे अनगिनत क्षेत्रों में किया गया योगदान नीति के स्तर पर इतनी प्रखरता से पहली बार सम्मिलित किया गया है. क्रियान्वयन में और विशेषरूप से हर स्तर पर पाठ्यक्रम निर्माण के समय इसका विशेष प्रभाव पड़ना ही चाहिए. इस नीति में पंथिक सद्भाव और सामजिक समरसता के लिए विशेष संस्तुतिया की गईं हैं. इनमे प्रजातंत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर विशेष बल दिया गया है. पहली बार उन पांच वैश्विक मानवीय मूल्यों को शामिल किया गया है जिनका प्रस्ताव 14 नवंबर 2000 को विमोचित स्कूल शिक्षा के पाठ्यक्रम की रुपरेखा में किया गया था. यह पांच हैं: सत्य अहिंसा, शांति, धर्म, और प्रेम! हर अध्यापक– वह कोई विषय पढ़ा रहा हो,  कोई गतिविधि करा रहा हो, यह ध्यान रखेगा कि इनमें से कौन-कौन से मूल्य उस अवसर पर इंगित किए जा सकते हैं, किस तरह बच्चों और युवाओं का ध्यान उनकी और आकर्षित किया जा सकता है. इस नीति का सजग और सतर्क क्रियान्वयन भारत की शिक्षा व्यवस्था को देश की मिट्टी से जोड़ेगा, भारत की संस्कृति की श्रेष्ठता को वैश्विक स्तर पर स्थापित करेगा. और उससे भी आगे – यह भारत को मैकाले से मुक्ति दिलाएगा. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)

ब्लॉगर के बारे में

जे एस राजपूत

जगमोहन सिंह राजपूत देश के जाने माने शिक्षाविद और लेखक हैं. श्री राजपूत एनसीइआरटी के निदेशक भी रहे हैं.

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