अपने पहले शतक की 30वीं सालगिरह पर बोले सचिन- सेंचुरी की नींव पाकिस्तान में पड़ी थी | cricket – News in Hindi

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अपने पहले शतक की 30वीं सालगिरह पर बोले सचिन- सेंचुरी की नींव पाकिस्तान में पड़ी थी

सचिन तेंदुलकर ने 14 अगस्त को लगाया था पहला शतक

सचिन तेंदुलकर (Sachin Tendulkar) ने 14 अगस्त, 1990 को इंग्लैंड के खिलाफ मैनचेस्टर टेस्ट में खेली थी नाबाद 119 रनों की पारी

  नई दिल्ली. मैनचेस्टर का ओल्ड ट्रैफर्ड मैदान. टीम इंडिया के सामने 408 रनों का विशाल लक्ष्य. टीम इंडिया की हार लगभग तय, क्योंकि उसने महज 183 रनों पर 6 विकेट गंवा दिये थे. कपिल देव, दिलीप वेंगसरकर, मोहम्मद अजहरुद्दीन जैसे दिग्गज पैवेलियन लौट चुके थे लेकिन फिर क्रीज पर आता है 17 साल का एक बच्चा, जिसपर पूरी दुनिया को अच्छी बल्लेबाजी का विश्वास तो जरूर था लेकिन ये यकीन नहीं था कि वो बल्लेबाज ऐसी पार खेल जाएगा जिसे दुनिया हमेशा याद रखेगी. हम बात कर रहे हैं सचिन तेंदुलकर के पहले इंटरनेशनल शतक की, जो उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ 14 अगस्त, 1990 को लगाया था.

सचिन ने कहा- पाकिस्तान में पड़ी थी पहले शतक की नींव
तीस साल पहले टेस्ट बचाने वाला शतक जमाने वाले सचिन तेंदुलकर ने बताया कि मैनचेस्टर में लगाये गए उस पहले सैकड़े की नींव सियालकोट में पड़ गई थी . तेंदुलकर ने अपने सौ शतकों में से पहला शतक 14 अगस्त 1990 को लगाया . वह पांचवें दिन 119 रन बनाकर नाबाद रहे और भारत को हार से बचाया उन्होंने अपने पहले शतक की 30वीं सालगिरह पर पीटीआई से कहा ,’ मैने 14 अगस्त को शतक बनाया था और अगला दिन स्वतंत्रता दिवस था तो वह खास था . अखबारों में हेडलाइन अलग थी और उस शतक ने श्रृंखला को जीवंत बनाये रखा .’

वकार की बाउंसर के दर्द ने बनाया मजबूतयह पूछने पर कि वह कैसा महसूस कर रहे थे , उन्होंने कहा ,’टेस्ट बचाने की कला मेरे लिये नयी थी .’ उन्होंने हालांकि कहा कि वकार युनूस का बाउंसर लगने के बाद नाक से खून बहने के बावजूद बल्लेबाजी करते रहने पर उन्हें पता चल गया था कि वह मैच बचा सकते हैं . उन्होंने कहा ,’ सियालकोट में मैने चोट लगने के बावजूद 57 रन बनाये थे और हमने वह मैच बचाया जबकि चार विकेट 38 रन पर गिर गए थे . वकार का बाउंसर और दर्द में खेलते रहने से मैं मजबूत हो गया .’

डेवोन मैल्कम का किया डटकर सामना
मैनचेस्टर टेस्ट में भी डेवोन मैल्कम ने तेंदुलकर को उसी तरह की गेंदबाजी की थी . तेंदुलकर ने कहा ,’ डेवोन और वकार उस समय सबसे तेज गेंदबाज हुआ करते थे . मैने फिजियो को नहीं बुलाया क्योंकि मैं यह जताना नहीं चाहता था कि मुझे दर्द हो रहा है . मुझे बहुत दर्द हो रहा था.’ उन्होंने कहा ,’ मुझे शिवाजी पार्क में खेलने के दिनों से ही शरीर पर प्रहार झेलने की आदत थी . आचरेकर सर हमें एक ही पिच पर लगातार 25 दिन तक खेलने को उतारते थे जो पूरी तरह टूट फूट चुकी होती थी . ऐसे में गेंद उछलकर शरीर पर आती थी .’

यह पूछने पर कि क्या उन्हें आखिरी घंटे में लगा था कि टीम मैच बचा लेगी, उन्होंने कहा ,’ बिल्कुल नहीं . हम उस समय क्रीज पर आये जब छह विकेट 183 रन पर गिर चुके थे . मैने और मनोज प्रभाकर ने साथ में कहा कि ये हम कर सकते हैं और हम मैच बचा लेंगे .’ उस मैच की किसी खास याद के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा ,’ मैं सिर्फ 17 साल का था और मैन आफ द मैच पुरस्कार के साथ शैंपेन की बोतल मिली थी . मैं पीता नहीं था और मेरी उम्र भी नहीं थी .  (भाषा के इनपुट के साथ)

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