राहत इंदौरी की किताब ‘मेरे बाद’: हमारे पांव का कांटा हमीं से निकलेगा | indore – News in Hindi

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राहत इंदौरी की किताब

राहत इन्दौरी की शायरी (Rahat Indori Shayari) : मशहूर शायर राहत इंदौरी (Rahat Indori) का मंगलवार को इंतकाल हो गया. राहत साहब काफी लंबे समय से कई बीमारियों से पीड़ित थे, जिसके चलते उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया था. उनकी रिपोर्ट कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव (COVID-19 Positive) आई थी. राहत इन्दौरी की किताब ‘मेरे बाद’ से उनकी कुछ ख़ास शायरियां ….

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1. सफ़र-सफ़र तेरी यादों का नूर जाएगा
हमारे साथ में सूरज ज़रूर जाएगाबिखर चुका हूँ मैं इमली की पत्तियों की तरह
अब और ले के कहाँ तक ग़ुरूर जाएगा

मेरी दुआओं, ज़रा साथ-साथ ही रहना
वो इस सफ़र में बहुत दूर-दूर जाएगा

दिलों का मैल ही सबसे बड़ी सदाक़त है
न जाने कब ये दिमाग़ी फ़ितूर जाएगा

ये मशवरा है कि बैसाखियाँ उधार न ले
उड़ंचियों से कोई कितनी दूर जाएगा,

चाँद मेहमां मेरे मकान में था
मैं ख़ुदा जाने किस जहान में था

इक कली मुस्कुरा के फूल हुई
ये क़सीदा भी तेरी शान में था

दिल्ली वालों को क्यों सुना आए
शेर तो लखनवी ज़ुबान में था

धूप की इक किरण भी सह न सका
वो परिन्दा जो आसमान में था.

राहत इंदौरी की किताब ‘मेरे बाद’ से शायरियां

2. हू-ब-हू तुमसे मिलता-जुलता हुआ
एक चेहरा हमारे ध्यान में था

न हमसफ़र न किसी हमनशीं से निकलेगा
हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा.

इसी जगह पे वो भूखा फक़ीर रहता था
तलाश कीजे खज़ाना यहीं से निकलेगा

मैं जानता था कि ज़हरीला साँप बन-बन के
तेरा खुलूस मेरी आस्तीं से निकलेगा

बुज़ुर्ग कहते थे इक रोज़ आएगा एक दिन
जहाँ पे डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा

गुजि़श्ता साल के जख्मों, हरे-भरे रहना
जुलूस अबके बरस भी यहीं से निकलेगा

ये राज़ जानना चाहो तो ‘मीर’ को पढ़ लो
फिर एक ‘हाँ’ का इशारा ‘नहीं’ से निकलेगा

3. हो लाख ज़ुल्म मगर बद्दुआ नहीं देंगे
ज़मीन मां है ज़मीं को दगा नहीं देंगे

हमें तो सिर्फ जगाना है सोने वालों को
जो दर खुला है, वहाँ हम सदा नहीं देंगे

रिवायतों की सफें तोड़कर बढ़ो वरना
जो तुमसे आगे हैं, वो रास्ता नहीं देंगे

ये हमने आज से तय कर लिया कि हम तुझको
करेंगे याद कि जब तक भुला नहीं देंगे

4. तुम्हारे नाम पर मैंने हर आफ़त सर पे रक्खी थी
नज़र शोलों पे रक्खी थी, ज़ुबां पत्थर पे रक्खी थी

हमारे ख्वाब तो शहरों की सड़कों पर भटकते थे
तुम्हारी याद थी, जो रात भर बिस्तर पे रक्खी थी

मैं अपना अज़्म लेकर मंजि़लों की सम्त निकला था
मशक्कत हाथ पे रक्खी थी, क़िस्मत घर पे रक्खी थी

इन्हीं साँसों के चक्कर ने हमें वो दिन दिखाए थे
हमारे पाँव की मिट्टी हमारे सर पे रक्खी थी

सहर तक तुम जो आ जाते तो मंज़र देख सकते थे
दीये पलकों पे रक्खे थे, शिकन बिस्तर पे रक्खी थी. (साभार/राधाकृष्ण प्रकाशन)

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