सेक्युलरिज्म की सीमाएं: भारतीय बुद्धिजीवी का आत्मस्वीकार | – News in Hindi

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सेक्युलरिज्म की सीमाएं: भारतीय बुद्धिजीवी का आत्मस्वीकार

पिछले दशकों में हिंदुत्व के विराट होते जाते संस्करण ने सेक्युलर बौद्धिक वर्ग को हतप्रभ कर दिया है. इस राजनीति की आलोचना तो हुई, लेकिन आलोचकों ने यह आत्मचिंतन कम किया कि क्या उनके उपकरण, मान्यता और प्रस्तावना में कुछ बुनियादी अभाव रहा, जिस वजह से वे हिंदुत्व को वैचारिक, राजनैतिक और व्यावहारिक चुनौती देनी में विफल रहे.

वरिष्ठ समाजविज्ञानी अभय कुमार दुबे की हालिया किताब ‘हिंदूएकता बनाम ज्ञान की राजनीति बहुसंख्यकवाद विरोधी विमर्श के आंतरिक अंतर्विरोध और अभाव केंद्र में रखती है. इस किताब को बोध है कि यह उपक्रम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थक होने का आरोप अर्जित कर सकता है लेकिन यह अपनी बौद्धिक निष्ठा के साथ समझौता नहीं करती.

सेक्युलर वर्ग अनेक आस्थाओं के साथ जी रहा है, जिन पर उसका समूचा विमर्श टिका है लेकिन जिन्हें वह प्रश्नांकित करने को तैयार नहीं. आस्था दुबे ऐसी कई आस्थाओं को गिनाते हैं. मसलन यह आस्था कहती है कि भारत की सामाजिक संस्कृति हिंदुत्ववादी परिजोयना को खुद ही परास्त कर देगी. भाजपा को वोट देता द्विज समुदाय सांप्रदायिकता का नैसर्गिक वाहक है, जबकि पिछड़े और दलित धर्मनिरपेक्षता के; उपेक्षित-दमित ग़ैर द्विज जातियां भाजपाई बहुसंख्यकवाद के ख़िलाफ़ क्रांतिकारी संघर्ष छेड़े हुए हैं और जल्द ही इसे पछाड़ देंगी. चुनावी लोकतंत्र अतिवादी विचारधाराओं को भोथरा कर उन्हें मध्यमार्ग अपनाने को विवश करता है. वामपंथी-धर्मनिरपेक्ष बौद्धिकता एक उच्चतर संरचना है जबकि संघ परिवार की बौद्धिकता निम्नतर.

दुबे इन सभी मान्यताओं को चुनौती देते हुए कहते हैं कि यह एकतरफा विमर्श न सिर्फ संघ को समझने में नाकाम रहा है, बल्कि राजनैतिक परिदृश्य का उचित आकलन नहीं कर पाया. मसलन स्वयं को बहुजन कहने वाली दलित राजनीति से अनेक धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों ने उम्मीद लगा रखी थी कि वह हिंदुत्व को परास्त कर देगी लेकिन ‘अपनी कमजोर सैद्धांतिकता, पुराने हिसाब चुकता करने के आग्रहों’ इत्यादि की वजह से यह बहुत जल्द बिखर गई.

हिंदुत्व के आलोचकों की सीमा यह है कि वह संघ के आंतरिक विमर्श और परिवर्तन से अनजान रहा आया है. वे  मानते हैं कि सावरकर और गोलवलकर ही अब तक संघ के विचार पुरुष बने हुए हैं. जबकि दुबे ऐतिहासिक दस्तावेजों को पलटते हुए बताते हैं कि संघ सत्तर के दशक के बाद पुरानी लीक से हटता गया, अम्बेडकर और फुले का विनियोग किया, उन्हें प्रातः स्मरणीय महापुरुषों की सूची में शामिल किया, पिछड़ों और अनुसूचित जातियों को अपने में समाहित कर लिया. भाजपा पर ब्राह्मणवाद का आरोप लगाते वक्त यह भुला दिया जाता है कि ‘उत्तर भारत में भाजपा शुरु से ही अति-पिछड़ों और अनुसूचित जातियों में भी अति-अनुसूचित जातियों की पार्टी बन कर उभरना चाहती थी.’

यह बौद्धिक चूक हतप्रभ कर देती है, क्योंकि संघ परिवार की गतिशीलता को समझने लिए किसी गहन अनुसंधान की ज़रूरत नहीं थी. सब कुछ आंखों के सामने, सुबह की शाखा में घटित हो रहा था. लेकिन संघ की आलोचना मनुस्मृति, ब्राह्मणवाद जैसे सुविधाजनक प्रत्ययों के इर्द-गिर्द घूमती रही. जबकि संघ ने बहुत पहले कई और रास्ते भी चुन लिए थे, मसलन मनुस्मृति को संशोधित करने का विमर्श बहुत पहले से चल रहा है, जो नजरअंदाज होता रहा.यह किताब लगातार ख़ंजर की धार पर चलती है. प्रचलित वाम-सेक्युलर बौद्धिक मान्यताओं को चुनौती देते वक्त इसे एहसास बना रहता है कि ज़रा भी फिसले तो कोई नहीं बचा पाएगा, लेकिन वैचारिक निष्ठा इसे बचा ले जाती है.

मसलन यह तीखा प्रश्न. धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी संघ पर आरोप लगाते हैं कि वह हिंदू धर्म का सामीकरण (सेमेटाइजेशन) करना चाहता है. दुबे पूछते हैं: ‘क्या सेमेटिक होना अपने में कोई बुरी बात है? क्या भारत में पहले से मौजूद इस्लाम, ईसाईयत और यहूदी धर्म सेमेटिक होने के कारण बुरे या कमतर हैं?’

ऐसे प्रश्नों से संघर्ष के बाद ही एक नई बौद्धिकी का जन्म होगा जो हिंदुत्व की चुनौती से निबट पाएगी. जिस जगह आज भारतीय राजनीति आ खड़ी है, अपने पूर्वाग्रहों से जूझे बगैर, संघ को समझे बगैर हिंदुत्व की आलोचना शायद कामयाब नहीं होगी.

दुबे का यह तर्क वाजिब है कि सेक्युलर अंग्रेज़ी वर्ग, संघ परिवार के आंतरिक परिवर्तन को इसलिए समझने में नाकाम रहा क्योंकि संघ अमूमन भारतीय भाषाओं में ख़ुद को व्यक्त करता है, जबकि अंग्रेज़ी बुद्धिजीवी इन भाषाओं की उलाहना करता है. इस तरह दुबे आशीस नंदी, रजनी कोठारी, आदित्य निगम, प्रतापभानु मेहता इत्यादि से लोहा लेते कहते हैं कि ‘चमकदार अंग्रेज़ी में लिखी ये तमाम प्रतिक्रियाएं अफ़सोस और अंदेशों से भरी हुई हैं, लेकिन इनमें आत्मालोचना के स्वर की भनक नहीं हैं.’

लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वह अंग्रेज़ी को धर्मनिरपेक्षता का एकमात्र ध्वजवाहक मानते हुए अंग्रेज़ी से कहीं अधिक अपेक्षा रखते हैं. उनकी आलोचना अंग्रेजी लेखक तक सीमित रहती है. प्रश्न यह भी है कि जिस विशाल हिंदी प्रदेश में हिंदुत्व की परियोजना शिखर पर पहुंची है, उस भाषा के लेखक-पत्रकार-बुद्धिजीवी का क्या दायित्व है? पिछले 30 वर्षों में यह प्रदेश बौद्धिक अगुवाई करने में विफल रहा है.

दूसरे, जिस अंग्रेज़ी की यह किताब आलोचना करती है, कई जगह उसके ही मुहावरे से प्रभावित दिखती है. किताब में ऐसी कई पदावलियां हैं जो अंग्रेज़ी से उद्धृत प्रतीत होती हैं जिनका हिंदी की संवेदनशीलता से कोई ख़ास संबंध नहीं दिखता, मसलन— राजनैतिक सतहीपन, अहानिकारक हाशिए, दुष्ट ब्राह्मणवाद. किताब को पढ़ते हुए लोहिया के निबंध याद आते रहते हैं. कितनी सहजता से वह तमाम राजनैतिक-सामाजिक संकटों का, भारतीय मिथकों का पुनर्पाठ कर देते थे.

डीआर नागराज ने एक बार आशीस नंदी से कहा था कि आप जिस ढांचे में आधुनिकता की आलोचना करते हों, वह आधुनिकता ने ही रचा है. इस तरह शायद यह आधुनिक बुद्धिजीवी की विडम्बना है जिसकी परछाईं नंदी पर गिरती है, दुबे पर भी— और शायद इन पंक्तियों के लेखक पर भी.

लेकिन यह उस रोशनी को मद्धिम नहीं करती जो दुबे की किताब से निकलती है. सेक्युलरिज्म के वर्तमान मॉडल को चुनौती देने का साहस करती यह अनिवार्य किताब भारतीय बुद्धिजीवी का आत्मस्वीकार है जिससे रूबरू हुए बग़ैर आगे का रास्ता शायद नहीं निकलेगा. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)

ब्लॉगर के बारे में

आशुतोष भारद्वाजलेखक, पत्रकार

गद्य की अनेक विधाओं में लिख रहे गल्पकार -पत्रकार-आलोचक आशुतोष भारद्वाज का एक कहानी संग्रह, एक आलोचना पुस्तक, संस्मरण, डायरियां इत्यादि प्रकाशित हैं। चार बार रामनाथ गोयनका सम्मान से पुरस्कृत आशुतोष 2015 में रॉयटर्स के अंतर्राष्ट्रीय कर्ट शॉर्क सम्मान के लिए नामांकित हुए थे। उन्हें भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, और प्राग के ‘सिटी ऑफ़ लिटरेचर’ समेत कई फेलोशिप मिली हैं. दंडकारण्य के माओवादियों पर उनकी उपन्यासनुमा किताब, द डैथ स्क्रिप्ट, हाल ही में प्रकाशित हुई है.

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