क्या लेबनान के दिवालिया होने में अमेरिका का भी हाथ है? | knowledge – News in Hindi

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क्या लेबनान के दिवालिया होने में अमेरिका का भी हाथ है?

बेरूत धमाके के बाद दबाव के चलते लेबनान के प्रधानमंत्री हसन दियाब ने अपनी पूरी कैबिनेट के साथ इस्तीफा दे दिया. 10 अगस्त की शाम इसकी घोषणा हुई. बता दें कि लेबनान पहले से ही आर्थिक तौर पर काफी कमजोर हो चुका था. यहां तक युवा सड़कों पर सरकार गिराने को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे. हालांकि माना जा रहा है कि कहीं न कहीं अमेरिकी की लेबनान पर सख्ती भी इस देश की बदहाली की जिम्मेदार है. जानिए, क्यों इसके लिए अमेरिका को भी दोषी माना जा रहा है.

देश में हरदम रही उथलपुथल
लेबनान को दुनिया की कुछ सबसे उथलपुथल भरी जगहों में माना जाता है. इसकी वजह ये है कि इसकी एक तरफ सीरिया है. दक्षिण में इजरायल है तो पश्चिम में साइप्रस है. सालों तक ईसाई और मुस्लिम धर्म में लड़ाई के बाद साल 1944 में लेबनान आजाद मुल्क बन गया. हालांकि तब भी इसके भीतर की हलचल कम नहीं हुई, बल्कि बढ़ती चली गई. असल में ईरान समर्थित हिज्बुल्लाह ने दूसरे देशों जैसे अमेरिका और इजरायल से लड़ाई के लिए लेबनान को मैदान की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.

हिज्बुल्लाह ने अमेरिका और इजरायल से लड़ाई के लिए लेबनान को मैदान की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया (सांकेतिक फोटो)

कौन है वो आतंकी संगठन, जिसके कारण त्रस्त है लेबनान
हिज्बुल्लाह की स्थापना साल 1982 में इजरायल के लेबनान पर हमले के बाद ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड ने की थी. समूह को लेबनान के शिया लोगों का भारी समर्थन मिला हुआ है. साथ में ईरान से इसकी फंडिंग होती है. यही वजह है कि मिडिल ईस्ट में ये आतंकी संगठन काफी मजबूती पा चुका है. स्कूल या अस्पताल चलाने जैसे कामों के बाद भी हिजबुल्लाह का असल काम पश्चिम और खासकर अमेरिका के काम में रोड़े डालना है. यही देखते हुए अमेरिका ने हिजबुल्लाह पर कई प्रतिबंध लगा डाले. इसके तहत हिज्बुल्लाह के आय के स्रोत को बाधित करने के लिए अमेरिका लेबनान के बैंकों से व्यापार कम कर चुका है.

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अमेरिका ने सारे देशों पर बनाया दबाव
इसके साथ ही अमेरिका अपने मित्र देशों से भी हिजबुल्लाह पर कड़ाई करने की बात करता रहा है. इसी मांग या यूं कहें कि दबाव के चलते जर्मनी ने भी हिजबुल्लाह पर पूरी तरह से इसी साल की मई में प्रतिबंध लगा दिया. बता दें कि अब तक जर्मनी केवल सैन्य गतिविधियों के कारण हिजबुल्लाह का विरोध करता आया था. इस तरह से अमेरिका और जर्मनी के साथ-साथ ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और लातिन अमेरिका के देश भी हिजबुल्लाह पर प्रतिबंध लगा चुके हैं.

अमेरिका अपने मित्र देशों से भी हिजबुल्लाह पर कड़ाई करने की बात करता रहा (सांकेतिक फोटो)

एक और एक्ट की तलवार
अब चूंकि लेबनान में सैन्य और राजनैतिक तौर पर भी ये संगठन काफी मजबूत है इसलिए अमेरिकी प्रतिबंधों का सीधा असर लेबनान की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. उदाहरण के लिए हाल ही में अमेरिका ने सीजर एक्ट पास किया है. इसे सीजर सीरिया सिविलियन प्रोटेक्शन एक्ट भी कहते हैं जो मूलतः सीरिया में चरमपंथियों जैसे हिजबुल्लाह को रोकने के लिए बनाया गया है. ये एक्ट एक फोटोग्राफर के नाम पर पड़ा है, जिसने सीरिया में हिजबुल्लाह समर्थित सरकार के आम लोगों पर हिंसा की 55,000 तस्वीरें खींची और दुनिया के सामने देश का हाल लेकर आया.

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कैसे पड़ेगा असर
अमेरिका द्वारा बनाए इस एक्ट का मसकद दूसरे देशों को सीरिया के साथ व्यापार करने से रोकना है. लेकिन इससे लेबनान पर भी सीधा और पक्का असर होगा. चूंकि सीरिया के आतंकी लेबनान में भी फैले हैं, लिहाजा वहां भी अमेरिकी मुद्रा नहीं पहुंचेगी. इस तरह से अमेरिका को एक ही तीर से दो-दो जगहों पर आतंकी गतिविधियां रोकने का मौका मिल जाएगा. और उम्मीद की जा रही है कि इससे ईरान की ताकत भी पस्त हो जाएगी.

बेरूत धमाके में राजधानी में अन्न का बड़ा भंडार बर्बाद हो गया (Photo-cnbc)

अमेरिकी प्रतिबंधों का असर लेबनान पर दिखने भी लगा है. हालांकि आतंकी संगठन की कमजोरी की बजाए ये आम लोगों की जेब पर दिख रहा है. देश पर कर्ज कुल जीडीपी से भी 170 गुना ज्यादा हो चुका है. हालात ये हैं कि यहां सामान्य सुविधाएं भी नहीं हैं.

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कैसी हालत है उस देश की
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक यहां दिन में 20 घंटे बिजली जाना आम बात है. सड़कों पर कूड़े के ढेर जमा हैं लेकिन कोई सफाईकर्मी नहीं. आधी से ज्यादा आबादी के पास काम नहीं. यहां तक कि देश के पास अपने सैनिकों को देने के लिए अब खाना तक नहीं रहा. कोरोना के कारण संकट और गहरा गया है. बड़ी संख्या में लोगों की नौकरियां चली गईं. कुल मिलाकर ये दिवालिया होने की कगार पर है. रही-सही कसर बेरूत धमाके ने पूरी कर दी. इस धमाके में राजधानी में अन्न का बड़ा भंडार बर्बाद हो गया.

यही वजह है कि पहले से ही सड़कों पर उतरे लोग तुरंत के तुरंत सरकार से इस्तीफा देने की मांग करने लगे. बता दें कि आर्थिक भूचाल के कारण ही पिछले साल भी लगभग समान हालातों में तत्कालीन पीएम साद अल-हरीरी को इस्तीफा देना पड़ा था और तब हसन दियाब की सरकार आई थी. अब ये सरकार भी गिर चुकी है और लेबनान की अर्थव्यवस्था टूटने की कगार पर है.

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