डराने वाले हैं हिरासत में मौत के आंकड़े, यहां औसतन हर रोज आती हैं 4 से 5 शिकायतें | nation – News in Hindi

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डराने वाले हैं हिरासत में मौत के आंकड़े, यहां औसतन हर रोज आती हैं 4 से 5 शिकायतें

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हिरासत में मौत के राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (National human rights commission) के आंकड़ों को देखें तो वो खासे डराने वाले हैं. आयोग के मुताबिक उनके यहां औसतन हर रोज़ 4 से 5 शिकायत पुलिस और जुडिशियल हिरासत (Police-Judicial custodi) में मौत की आती हैं.

नई दिल्ली. जून में तमिलनाडु पुलिस (Tamil Nadu Police) ने इसलिए बाप-बेटे को हिरासत में ले लिया था कि वो लॉकडाउन (Lockdown) के दौरान दुकान खोलकर बैठे हुए थे. लेकिन अगले दिन दोनों बाप-बेटे की पुलिस हिरासत में मौत हो जाती है. इसे लेकर देशभर में खासी चर्चाएं भी हुईं. लेकिन हिरासत में मौत का जून से लेकर अब तक का यह अकेला और अनोखा केस नहीं था जिसे लेकर चर्चाएं हो रही हैं. हिरासत में मौत के राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (National human rights commission) के आंकड़ों को देखें तो वो खासे डराने वाले हैं.

आयोग के मुताबिक उनके यहां औसतन हर रोज़ 4 से 5 शिकायत पुलिस (Police) और जुडिशियल हिरासत (Police-Judicial custodi) में मौत की आती हैं. हर महीने शिकायतों को निपटाते हुए आयोग राज्य सरकारों से पीड़ित परिवार को आर्थिक मुआवजा देने की सिफारिश भी करता है. गौरतलब है कि गुजरात (Gujarat) के आईपीएस (IPS) संजीव भट्ट ऐसे ही एक आरोप के बाद सजा काट रहे हैं.

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हिरासत में होने वाली मौतों पर यूपी के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह का कहना है कि मौत थाने-तहसील के लॉकआप और जेल में होती हैं. थाने में मौत होने पर उस वक्त डयूटी पर तैनात सभी पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर जांच कराई जानी चाहिए. जांच को जल्दी कर दोषी को सजा मिलनी चाहिए. जबकि हमारे यहां होता इसका उलट है. 10 फीसद केस ही साबित हो पाते हैं.

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हिरासत में हुई मौत के आंकड़े.

मानव अधिकारों में बदलाव हुए, लेकिन आईपीसी में नहीं

कस्टोडियल डैथ को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट मोहम्मद इरशाद अहमद का कहना है कि राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग हर महीने शिकायतों को निपटाते हुए आयोग राज्य सरकारों से पीड़ित परिवार को आर्थिक मुआवजा देने की सिफारिश करता है. आयोग यह सब जांच होने के बाद करता है. आयोग की यह कार्रवाई बताती है कि कहीं कुछ तो गड़बड़ है. वहीं दूसरी ओर आयोग तो अपना काम सही से कर रहा है लेकिन कुछ कमी आईपीसी में है. मानव अधिकारों में वर्ल्ड लेवल पर बदलाव होते हैं. इन्हें मानना हमारी मजबूरी भी होती है. लेकिन कस्टोडियल डैथ को लेकर आईपीसी में कोई बदलाव नहीं किया गया है, जो बेहद जरूरी भी है.

कस्टोडियल डैथ पर यह बोला मानव अधिकार आयोग

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी जैमिनी कुमार श्रीवास्तव का इस बारे में कहना है कि कस्टोडियल डैथ के मामले में सूचना मिलने के बाद हम जांच करते हैं. अगर वाकई उसमे पुलिस या जेल प्रशासन की लापरवाही पाई जाती है तो हम आर्थिक मुआवजे के साथ कार्रवाई किए जाने की सिफारिश भी करते हैं. लेकिन कानूनी कार्रवाई कराए जाने का अधिकार अदालत को है. ऐसे किसी भी मामले में ज़िले के एसएसपी को आयोग को सूचना देनी होती है. अगर ऐसा नहीं होता है और आयोग को जब इस बारे में शिकायत मिलती है या मीडिया से पता चलता है तो इस पर भी राज्य की पुलिस से जवाब-तलब होता है.

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