PM Narendra Modi address Conclave on Transformational Reforms in Higher Education National Education Policy | Education Policy: पीएम मोदी बोले- नए भारत की नींव तैयार करेगी नई शिक्षा नीति, भेड़चाल के लिए जगह नहीं

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PM Narendra Modi address Conclave on Transformational Reforms in Higher Education National Education Policy | Education Policy: पीएम मोदी बोले- नए भारत की नींव तैयार करेगी नई शिक्षा नीति, भेड़चाल के लिए जगह नहीं


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज (7 अगस्त) वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए देश की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy) पर अपने विचार रखे। शिक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजित किए गए कॉन्क्लेव के उद्घाटन भाषण में पीएम मोदी ने कहा, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 21वीं सदी के नए भारत की नींव तैयार करने वाली है। जिसमें भेड़चाल के लिए कोई जगह नहीं होगी। 21वीं सदी के भारत से पूरी दुनिया को बहुत अपेक्षाएं हैं। भारत का सामर्थ्य है कि वो टैलेंट और टेक्नॉलॉजी का समाधान पूरी दुनिया को दे सकता है 

पीएम ने कहा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति आने के बाद देश के किसी भी क्षेत्र से, किसी भी वर्ग से ये बात नहीं उठी कि इसमें किसी तरह का पक्षपात है, या किसी एक ओर झुकी हुई है। हर देश अपनी शिक्षा व्यवस्था को अपनी राष्ट्रीय मूल्यों (National Values) के साथ जोड़ते हुए, अपने राष्ट्रीय लक्ष्य (National Goals) के अनुसार सुधार (Reform) करते हुए चलता है। मकसद ये होता है कि देश की शिक्षा व्यवस्था (Education System) अपनी वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को भविष्य के लिए तैयार रखें और भविष्य के लिए तैयार (Future Ready) करें।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा-

  • जड़ से जग तक, मनुज से मानवता, अतीत से आधुनिकता तक इन सभी बिंदुओं का समावेश करते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति का स्वरूप तय किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति सिर्फ सर्कुलर जारी करके, नोटिफाई करके लागू नहीं होगी। इसके लिए मन बनाना होगा, आप सभी को दृढ़ इच्छाशक्ति दिखानी होगी। भारत के वर्तमान और भविष्य को बनाने के लिए आपके लिए ये कार्य एक महायज्ञ की तरह है।
     
  • बीते अनेक वर्षों से हमारे शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव नहीं हुए थे। परिणाम ये हुआ कि हमारे समाज में जिज्ञासा और कल्पना (Curiosity and Imagination) के महत्व को को प्रमोट करने के बजाय भेड़चाल को प्रोत्साहन मिलने लगा था।आज गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर की पुण्यतिथि भी है। वो कहते थे- उच्चतम शिक्षा वो है जो हमें सिर्फ जानकारी ही नहीं देती, बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सद्भाव में लाती है। निश्चित तौर पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति का बृहद लक्ष्य इसी से जुड़ा है।
     
  • इस बात में कोई विवाद नहीं है कि बच्चों के घर की बोली और स्कूल में पढ़ाई की भाषा एक ही होने से बच्चों के सीखने की गति बेहतर होती है। ये एक बहुत बड़ी वजह है जिसकी वजह से जहां तक संभव हो, पांचवी तक, बच्चों को उनकी मातृभाषा में ही पढ़ाने पर सहमति दी गई है।
     
  • अभी तक हमारी जो शिक्षा व्यवस्था है, उसमें ‘व्हाट टू थिंक’ (What to Think) पर फोकस रहा है जबकि इस शिक्षा नीति में ‘हाऊ टू थिंक’ (How to think) पर बल दिया जा रहा है। आज जिस दौर में हम हैं, वहां इन्फोर्मेशन और कंटेट (Information and Content) की कोई कमी नहीं है। अब कोशिश ये है कि बच्चों को सीखने के लिए इन्क्वायरी बेस्ड (Inquiry based), डिस्कवरी बेस्ड (Discovery based), डिस्कशन बेस्ड (Discussion based) और एनालिसिस बेस्ड (Analysis based) तरीकों पर जोर दिया जाए। इससे बच्चों में सीखने की ललक बढ़ेगी और उनके क्लास में उनकी भागीदारी भी बढ़ेगी।
     
  • हर विद्यार्थी को ये अवसर मिलना ही चाहिए कि वो अपने Passion को फॉलो करे। वो अपनी सुविधा और ज़रूरत के हिसाब से किसी डिग्री या कोर्स को कर सके और अगर उसका मन करे, तो वो छोड़ भी सके। कोई कोर्स करने के बाद स्टूडेंट जब जॉब के लिए जाता है तो उसे पता चलता है कि जॉब की रिक्वायरमेंट पूरा नहीं करता है। कई स्टूडेंट्स को अलग-अलग वजहों की स्थिति में कोर्स छोड़कर जॉब करनी पड़ती है। ऐसी सभी स्थितियों का ख्याल रखते हुए मल्टीपल एंट्री और एग्ज़िट (Multiple entry and Exit) का विकल्प भी दिया गया है।
     
  • जब गांवों में जाएंगे, किसानों, श्रमिकों, मजदूरों को काम करते देखेंगे, तभी तो उनके बारे में जान पाएंगे, उन्हें समझ पाएंगे, उनके श्रम का सम्मान करना सीख पाएंगे। इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति में छात्र शिक्षा और श्रम की गरिमा पर (Student education and Dignity of Labour) पर बहुत काम किया गया है।
     
  • शिक्षा व्यवस्था में बदलाव, देश को अच्छे छात्र, अच्छे प्रोफेशनल्स और उत्तम नागरिक देने का बहुत बड़ा माध्यम अध्यापक और प्रोफेसर्स ही हैं। इसलिए नेशनल एजुकेशन पॉलिसी में शिक्षकों की गरिमा (Dignity of Teachers) का भी विशेष ध्यान रखा गया है।
     

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति हमारे देश में रिसर्च और एजुकेशन के गैप को खत्म करने में अहम भूमिका निभाने वाली है। जब संस्थानों और इंफ्रास्ट्रक्चर में भी ये रिफॉर्म्स रिफ्लेक्ट होंगे, तभी राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अधिक प्रभावी और त्वरित गति से लागू किया जा सकेगा।
     

  • एक प्रयास ये भी है कि भारत का जो टेलेंट है, वो भारत में ही रहकर आने वाली पीढ़ियों का विकास करे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में टीचर्स की ट्रेनिंग पर बहुत जोर है, वो अपनी स्किल्स लगातार अपडेट करते रहें, इस पर बहुत जोर है। टेक्नोलॉजी ने हमें बहुत तेजी से, बहुत अच्छी तरह से, बहुत कम खर्च में, समाज के आखिरी छोर पर खड़े स्टूडेंट तक पहुंचने का माध्यम दिया है। हमें इसका ज्यादा से ज्यादा उपयोग करना है।

शिक्षा मंत्रालय और UGC ने आयोजित किया सम्मेलन
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत उच्च शिक्षा में परिवर्तनकारी सुधारों (Reforms in Higher Education) पर आयोजित सम्मेलन में जोर दिया गया कि भारत के शिक्षा क्षेत्र में बदलाव से युवाओं को क्या लाभ होगा। इस सम्मेलन का आयोजन मानव संसाधन विकास मंत्रालय (शिक्षा मंत्रालय) और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा किया गया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल, केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री संजय धोत्रे, विश्वविद्यालयों के कुलपति, संस्थानों के निदेशक और कॉलेजों के प्रधानाचार्यों ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया। 

गौरतलब है कि, केंद्रीय कैबिनेट देश की नई शिक्षा नीति को मंजूरी दे चुकी है। इससे पहले शिक्षा नीति को 1986 में तैयार किया गया और 1992 में संशोधित किया गया था। डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रारूप तैयार करने के लिए गठित समिति द्वारा तैयार किए गए एनईपी 2019 और उस पर प्राप्त हितधारकों की प्रतिक्रियाओं और सुझावों के आधार पर इसे तैयार किया गया है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा, नई शिक्षा नीति के लिए सलाह की प्रक्रिया जनवरी 2015 में शुरू की गई थी। 33 चिन्हित किए गए विषयों पर बहुआयामी परामर्श प्रक्रिया में ग्राम स्तर से राज्य स्तर तक जमीनी स्तर पर परामर्श हासिल किए गए। लगभग 2.5 लाख ग्राम पंचायतों, 6600 ब्लॉक, 6000 शहरी स्थानीय निकायों, 676 जिलों और 36 राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में एक व्यापक, समयबद्ध, भागीदारी वाली परामर्श प्रक्रिया अपनाई गई।

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