साधक रामप्रसाद के विलक्षण भक्ति, जानीं इनका बारे में…

रामप्रसाद के जनम हुगली जिला के गरलगाछा में एगो तांत्रिक ब्राह्मण परिवार में भइल रहे. परिवार के लोग शाक्त रहे. रामप्रसाद के जनम साल के लेके केहू- केहू विवाद करेला. केहू कहेला कि उनुकर जनम 1718 ईस्वी में भइल रहे त केहू कहेला कि ना 1723 ईस्वी में. हमनीं का उनुकर जनम 1718 ईस्वी मानि के चलीं जा.

साधक रामप्रसाद सेन ( 1718 ईस्वी– 1775 ईस्वी) बंगाल के एगो शाक्त कवि आ संत रहले. उनुकरा के लोग रामप्रसाद के नांव से ढेर जानेला. उनुकर टाइटिल सेन रहल, ई कमे लोग जानेला. उनुकर लिखल भजन रामप्रसादी गान कहाला. आज भी रामप्रसादी भजन बंगाल में बहुत लोकप्रिय बा. शाक्त का ह? जे शक्ति के पूजा करेला. भगवान शिव अनंत के प्रतीक हउवन आ मां पार्वती शक्ति के प्रतीक. कृष्ण काल (भगवान कृष्ण के समय) में द्वापर युग रहे. ओह घरी ब्रज में शाक्त संस्कृति के प्रभाव बहुते बढ़ि चुकल रहे. ब्रज में महामाया, महाविद्या, करोली, सांचोली आदि विख्यात शक्तिपीठ बाड़न स. मथुरा के राजा कंस, वासुदेव- यशोदा से उत्पन्न जौना कन्या के वध करेके चहले, ओकरा के भगवान श्रीकृष्ण के प्राणरक्षिका देवी के रूप में पूजा कइल जाला. देवी शक्ति के इहे मान्यता ब्रज से सौराष्ट्र तक फइलल बा. आज से 100 बरिस पहिले तक ब्रज तांत्रिकन के प्रमुख गढ़ रहे. एइजा के तांत्रिक भारत भर में प्रसिद्ध रहे लोग. कामवन भी राजा कामसेन के समय तंत्र विद्या के मुख्य केंद्र रहे, कामसेन के दरबार में बहुते तांत्रिक लोग रहत रहे. रामप्रसाद के जनम हुगली जिला के गरलगाछा में एगो तांत्रिक ब्राह्मण परिवार में भइल रहे. परिवार के लोग शाक्त रहे. रामप्रसाद के जनम साल के लेके केहू- केहू विवाद करेला. केहू कहेला कि उनुकर जनम 1718 ईस्वी में भइल रहे त केहू कहेला कि ना 1723 ईस्वी में. हमनीं का उनुकर जनम 1718 ईस्वी मानि के चलीं जा. रामप्रसाद के पिता डॉ रामराम सेन आयुर्वेद के डाक्टर रहले. पिता उनुका के एगो संस्कृत स्कूल में पढ़े के भेजले. ओह स्कूल में रामप्रसाद संस्कृत ग्रामर, संस्कृत साहित्य, फारसी आ हिंदी के ज्ञाता बनले. अब कल्पना करीं कि ओह घरी के स्कूल आजु का तुलना में कौना स्टैंडर्ड के रहले सन. ओह घरी स्कूल के पढ़ाई उच्च स्तर के रहे. पिता के इच्छा रहे कि रामप्रसाद उनुके नियर आयुर्वेद के डाक्टर बनसु. बाकिर रामप्रसाद दिन- रात मां काली के भक्ति मे डूबल रहसु. भजन लिखल, गावल आ ध्यान कइल. दिन- दुनिया से कौनो मतलबे ना रहे उनुका. पिता के लागल कि उनुकर बियाह क दियाई त का जाने सुधरि जासु. पहिले इहे धारणा रहे. त 22 साल के उमिर में रामप्रसाद के सर्वानी नांव वाली एगो सुंदर कन्या से बियाह हो गइल. नव दंपति के गुरु माधवाचार्य दीक्षा दिहले. जब गुरु रामप्रसाद के कान में मंत्र दिहले त रामप्रसाद मां काली के ध्यान में डूबि गइले आ समाधि अवस्था में पहुंचि गइले. रामप्रसाद अब ओह गुरु के खोज में लगले जे उनुका के साधना करावे. ईश्वर के साक्षात्कार करावे. आखिरकार जल्दिए उनकर भेंट प्रसिद्ध तांत्रिक गुरु कृष्णानंद अगमवागीशा से हो गइल. कृष्णानंद जी विख्यात पुस्तक “तंत्रसार” के लेखक रहले आ मां काली के परम भक्त. रामप्रसाद के महसूस हो गइल कि ईहे उनुकर गुरु हउवन. त ऊ कृष्णानंद जी से दीक्षा लिहले. कृष्णानंद जी उनुका के साधना के पद्धति दिहले आ अपना देखरेख में उनुका के ट्रेनिंग दिहले, मां काली के पूजा विधि बतवले. त अब सुरु भइल रामप्रसाद के साधना. रामप्रसाद साधना में एतना आसक्त हो गइले कि गुरु कृष्णानंद उनुका के आसिरबाद दिहले कि तोहरा के मां काली के दरसन मिली. मां काली तोहरा पर अति प्रसन्न बाड़ी. रामप्रसाद के साधना पूरा भइल. तले रामप्रसाद के पिता के अचानक मृत्यु हो गइल. परिवार आर्थिक संकट में आ गइल. रामप्रसाद के बियाह हो गइल रहे. बेटा राम दुलाल के जनम हो चुकल रहे. जीविका खातिर रामप्रसाद के कलकत्ता जाएके परल. कलकत्ता के एगो बहुत धनी आदमी दुर्गा चरण मित्र किहां ऊ एकाउंटेंट के नोकरी पवले. तनखाह रहे 30 रुपया महीना. रामप्रसाद तंत्र विद्या के अलावा गणित के गहिर जानकार रहले. कुछु दिन नोकरी कइले तले एगो घटना हो गइल. एकाउंट बुक पर ऊ हिसाब- किताब ना लिखि के मां काली के खूब सुंदर भजन लिखे लगले. एकाउंट विभाग के लोग एकर सिकाइत मालिक दुर्गा चरण का लगे कइल. दुर्गा चरण खुद मां काली के परम भक्त रहले. एकाउंट बुक पर भजन देखि के उनुका मन में रामप्रसाद के प्रति सहानुभूति जागल. ऊ रामप्रसाद के बोलवले आ कहले कि अब तूं अपना गांवे जा. ओइजे ध्यान, साधना आ गीत लेखन कर. तोहरा के 30 रुपया तनखाह मिलत रही. कहाउत ह कि जौन रोगिया के भावे तौन बैदा फरमावे. त जौन रामप्रसाद चाहत रहले तौन मिलि गइल. ऊ अपना गांवे अइले आ एगो पंचवटी बनवले. पंचवटी में पांच गो पवित्र पेड़ रहेले सन- वट वृक्ष, बेल वृक्ष, आंवला वृक्ष, अशोक वृक्ष आ पीपल वृक्ष. रामप्रसाद घनघोर साधना कइले आ मां काली के बहुते सुंदर आ मधुर भजन लिखले आ गवले. रामप्रसाद के स्वर बहुत मीठ आ आकर्षक रहल. आखिर एक दिन रामप्रसाद के मां काली दर्शन, आसिरबाद दिहली. उनुकर ख्याति फइले लागल. ओह घरी नवाब सिराजुद्दौला के बंगाल में राज रहे. सिराजुद्दौला के राज में नदिया के जमींदार राजा कृष्णचंद्र भी मां काली के भक्त रहले. त रामप्रसाद के ख्याति कृष्णचंद्र का लगे पहुंचल. त ऊ रामप्रसाद के अपना दरबार के कवि नियुक्त क दिहले. बाकिर रामप्रसाद सायदे कबो दरबार में जासु. ऊ त हरदम साधना, भजन आ जप में लीन रहसु. बाकिर तबो कृष्णचंद्र रामप्रसाद के बहुत मानसु. राजा उनुका के ओह घरी 100 एकड़ टैक्स फ्री जमीन दिहले. त रामप्रसाद भी अपना किताब “विद्यासुंदर” राजा के समर्पित कइले. रामप्रसाद के नांव सुनि के नवाब सिराजुद्दौला उनुका के अपना दरबार में आव खातिर आग्रह कइलस. रामप्रसाद एक बार ओकरो दरबार में गइले त उनुकर खूब आदर- खातिर भइल. रामप्रसाद के बुढ़ापा आइल त बेटा राम दुलाल आ पतोह भगवती उनुकर खूब सेवा कइल लोग. दीपावली के रात में बंगाल में कालीपूजा होला. ओह दिन काली जी के मूर्ति का लगे बइठि के आ नाचि के रात भर रामप्रसाद भजन गावसु. अपना जीवन के आखिरी दीपावली माने सन 1775 में में रामप्रसाद रात भर भजन गवले, ध्यान कइले, भक्ति में बिह्वल होके नचले. सबेरे काली जी के माटी के मूर्ति के गंगा नदी में भसान (विसर्जन) रहे. मूर्ति का संगे गंगा जी में रामप्रसाद गइले. एइजा एगो किंवदंती बा. किंवदंती बा कि सन 1775 में दीपावली के बिहान भइला मां काली के मूर्ति के भसान भइल आ रामप्रसाद मां काली, मां काली कहते गरदन पर पानी में चलि गइले. भक्ति में मतवाला रामप्रसाद गंगा में कब समा गइले केहू ना जानल. बहुत लोग कहेला कि रामप्रसाद के गरदन भर पानी में ढुकते समाधि लागि गइल आ ऊ भक्ति के नशा में डूबि के नदी में समा गइले. बाकी ई किंवदंती ह. साक्ष्य का बा? एगो कबूलाती पत्र ओह घरी जारी होत रहे जौना में कौनो आदमी कुछु स्वीकारोक्ति करे- माने गवाही दे. इहे कबूलाती बतावता कि रामप्रसाद 1794 तक जीयत रहले. 1794 के कबूलाती पर उनुकर दस्तखत बा. त ऊपर जौन हम मृत्यु के तारीक देले बानी, ऊ गलत साबित हो गइल. बाकी सरकार एमें हमार दोस नइखे. जौन सच्चाई बा तौने हम कहतानी.एगो बहुत प्रसिद्ध घटना उनुका जीवन से जुड़ल बा. एक बार पूजा के पहिले ऊ नहाए जात रहले. रास्ता में एगो खूब सुंदर आ पवित्र स्त्री मिलल. स्त्री कहलस कि तोहार बहुत नांव सुनले बानी. मां काली के एगो भजन हमरा के सुनाव. रामप्रसाद कहले कि हमरा पूजा में लेट होता. रउवां तनी इंतजार करीं. हम नहा के आवते बानी. नहा के अइले त रामप्रसाद देखतारे कि ऊ स्त्री गायब बिया. रामप्रसाद मन में कहले कि ई जगन्माता के खेल ह. माता के खेल केहू ना बुझि सकेला. जब ऊ ध्यान में बइठले त एगो दिव्य प्रकाश में माता अन्नपूर्णा के दर्शन भइल. माता अन्नपूर्णा कहली कि हम बनारस के अन्नपूर्णा माता हईं. तोहार भजन सुने खातिर बनारस से आइल बानी. बाकिर अफसोस हमार इच्छा ना पूरा भइल. अब हम जातानी. रामप्रसाद के बहुत ग्लानि भइल. ऊ तुरंते बनारस रवाना हो गइले आ अन्नपूर्णा मंदिर में रहि के दिन रात भजन गावे लगले. ओइजा रामप्रसाद बहुत दिन रहले आ अन्नपूर्णा माता के आपन भजन सुनवले. (लेखक विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)





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