भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़

[जून, 1928, ‘किरती’ में इन दो विषयों पर टिप्पणियाँ छपीं. भगत सिंह ‘किरती’ के सम्पादक मंडल में थे. उस समय उनके विचारों सम्बन्धी कुछ झलक इनसे भी मिल सकती है. -सं.]

शहीद भगत सिंह न केवल एक क्रांतिकारी थे बल्कि उनकी कलम भी आग उगलती थी. उनके विचारों का असर था कि अंग्रेज उनसे खौफ खाते थे. भगत सिंह की कलम परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े भारत माता के लाल किसानों के आंदोलन से लेकर महात्मा गांधी के सत्याग्रह तक पर चली थी. अगर आपको भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों से अवगत होना तो ‘भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’ नामक पुस्तक आपका ज्ञानवर्धन कर सकते हैं. इस पुस्तक का संपादन जगमोहन सिंह और चमन लाल ने किया है. इस पुस्तक में भगत सिंह की लेखनी से आप रू-ब-रू हो सकते हैं. पुस्तक के कुछ अंश नीचे हैं. 

सत्याग्रह
1928 में हिन्दुस्तान में फिर प्राण धड़कते नज़र आने लगे हैं. एक ओर हड़तालों का जोर है और दूसरी ओर सत्याग्रह की तैयारियाँ शुरू हो रही हैं. यह लक्षण बड़े अच्छे हैं. सबसे बड़ा सत्याग्रह बारदोली (गुजरात प्रान्त) के किसान कर रहे हैं. तीस सालों के बाद नया आन्दोलन किया जाता है और हर बार जमीन का लगान बढ़ा दिया जाता है. इसी तरह इस बार भी बन्दोबस्त हुआ और मामला बढ़ा दिया गया. लोग बेचारे क्या करें? गरीब किसान तो पहले ही पेट भरकर रोटी नहीं खा सकते और वे पहले से 22 प्रतिशत लगान कहाँ से दें. सत्याग्रह की तैयारियाँ की गईं. महात्मा गांधी ने लाट पंजाब के साथ पत्र-व्यवहार कर लगान कम करवाने का यत्न किया था लेकिन जनाब, सिर्फ पत्र-व्यवहार से सर झुकानेवाली सरकार यह नहीं है. कुछ असर न हुआ. सत्याग्रह करना ही पड़ा. गुजरात में पहले भी किसान एक-दो बार बड़ा भारी सत्याग्रह करके सरकार को हरा चुके हैं. पहले-पहल 1917-18 में बारिश अधिक होने से फसलें खराब हो गई थीं और रुपए में चार आना भी नहीं हुईं. कानून यह था कि रुपए में छह आने से कम फसल होने से उस साल लगान न लिया जाए, अगले वर्ष एक साथ ले लिया जाए. उस साल लोगों ने जब कहा कि चार आने भी फसल नहीं हुई तो सरकार नहीं मानी. फिर महात्मा गांधी जी ने काम हाथ में ले लिया. एक सभा की. लोगों को बताया कि यदि आप लगान देने से इनकार करोगे तो आपकी जायदाद जब्त हो जाएगी, क्या आप तैयार हैं? लोग चुपचाप बैठे रहे तो बम्बई के सत्याग्रही नेता इस बात पर बड़े नाराज हुए और चल दिए. लेकिन फिर एक बुड्ढा किसान उठा और उसने कहा कि हम सबकुछ सहन करेंगे और बाद में सभी लोग यही कहने लगे. सत्याग्रह शुरू हुआ. सरकार ने भी जायदाद और जमीनें जब्त करना शुरू कर दिया, लेकिन दो महीने बाद सरकार ने सिर झुका दिया और जमींदारों ;घ्द्ध की शर्त मान ली.दूसरी बार जब महात्मा जी 1923-24 में जेल में थे तब सत्याग्रह हुआ. पहली बार 600 गाँवों ने हिस्सा लिया था. इस बार 94 गाँवों का लगान बढ़ाया और इन गाँवों ने सत्याग्रह किया. उन पर ताजीरी टैक्स लगाया गया था. वहाँ नियम था कि सूर्यास्त होने पर जायदाद कुर्क नहीं हो सकती थी और किसान सवेरे ही अपने-अपने घरों को ताले लगाकर चले जाते और पुलिस को कोई गवाह तक न मिलता. अधिक तंग आकर सरकार ने टैक्स वापस ले लिया. इस बार बारदोली में सत्याग्रह शुरू हुआ है. बारदोली मंें 1921-22 में आज़ादी के लिए बड़ा भारी सत्याग्रह करने की तैयारियाँ की गई थीं. सब किस्मत के खेल! बना-बनाया खेल बिगड़ गया. खैर, उन पिछली बातों का क्या करना. अब उस इलाके का बन्दोबस्त सरकार ने किया. बेचारे किसानों की मुसीबत, अच्छा बन्दोबस्त हुआ, 22 प्रतिशत लगान बढ़ गया! बहुत कहा गया लेकिन सरकार कब मानती है. श्री बल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में काम शुरू हो गया और किसानों ने लगान देने से मना कर दिया. अब जब्ती अधिकारी और सारे ही अफसर बारदोली ताल्लुके की ओर इकट्ठे हुए हैं. जो उनसे हो सकता है, लोगों को गलत रास्ते पर डालने के लिए कर रहे हैं. जायदाद जब्त की जा रही है, जमीनें जब्त करने के हुक्म जारी हो रहे हैं. लेकिन माल, सामान उठाने के लिए आदमी नहीं मिलते. इस समय काम वहाँ जोरों पर है, लेकिन एक मजे की बात यह है कि सारा काम बड़ी शान्ति से हो रहा है. वे अफसर जो लोगों को तंग करने आए थे, उनके साथ बड़े प्यार का व्यवहार किया जाता है. पहले उन्हें रोटी-पानी नहीं मिलता था, अब पटेल ने कहा कि उन्हें रोटी-पानी जरूर दे दिया करो. एक दिन शराब की दुकान से चार टिन कुर्क किए गए, लेकिन उठानेवाला कोई न मिला. जब अधिकारी ने कहा, ‘बड़ी प्यास लगी है, पानी तो दो,’ तो झट एक सेवादार सत्याग्रही ने सोडे की बोतल लाकर पिलाई. इस तरह काम बड़े जोरों से, पूरी शान्ति से चल रहा है. बड़ी उम्मीद है कि सरकार को अधिक झुकना पड़ेगा.

दूसरी जगह कानपुर है जहाँ सत्याग्रह होनेवाला है. पिछले दिनों कानपुर में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए. बाद में ताजीरी पुलिस बिठाई गई. कुछ दिन हुए कि कानपुर के कौंसिल सदस्य श्री गणेशशंकर विद्यार्थी जी सम्पादक ‘प्रताप’, कानपुर को एक पत्र मजिस्ट्रेट से मिला कि अपने दफ्तर के सभी कर्मचारियों की सूची और उनका वेतन या पद लिखकर भेजें, क्योंकि तारी ताजीरी टैक्स वसूल किया जाना है. लेकिन विद्यार्थी जी ने लिख भेजा कि मैं कोई टैक्स देने को तैयार नहीं हूँ और न ही इस काम मंें कोई सहायता ही करूँगा, क्योंकि दंगा पुलिस ने करवाया था. हमें उसका दंड नहीं मिलना चाहिए. लोगों ने विद्यार्थी जी से पूछा कि हम क्या करें? आपने कहा कि मुसीबत आएगी, नुकसान अधिक होगा, लेकिन यह अत्याचारी टैक्स नहीं देना चाहिए. जलसे हुए. 7000 व्यक्तियों ने टैक्स न देने के कागजों पर हस्ताक्षर कर सरकार को भेज दिए. तैयारियाँ हो रही हैं.

तीसरी जगह मेरठ है. वहाँ भी बन्दोबस्त हुआ और लगान बढ़ गया. वहाँ भी सत्याग्रह की घोषणा कर दी गई है.

पंजाब में भी कुछ ऐसी ही बातें नज़र आ रही हैं. शेखूपुर और लाहौर जिलों में ओले गिरने से फसलें नष्ट हो गई थीं. अनाज कुछ भी नहीं हुआ, फिर लगान कैसे दिया जाए? लेकिन यहाँ के सयाने-सयाने आदमी और ही तरह की बातें करते हैंदृ”कांग्रेस के ‘बदनाम’ आदमी उन किसानों में भाषण न दें, कहीं सरकार नाराज न हो जाए!“ ऐसी-ऐसी बातें हो रही हैं, लेकिन उन्हें अच्छी तरह याद रखना चाहिए कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते. अंग्रेज पैसे के पीर और उम्मीद यह की जाए कि वे लगान अपने आप माफ कर देंगे. यह भ्रम अभी कब तक चलेगा?

हड़तालें
उधर सत्याग्रह की धूम है और इधर हड़तालों का भी कुछ कम जोर नहीं. बड़ी खुशी इस बात की है कि देश में फिर प्राण जगे हैं और पहले-पहल ही किसानों और श्रमिकों का युद्ध छिड़ा है. इस बात का भी आनेवाले बड़े भारी आन्दोलन पर असर रहेगा. वास्तव में तो यही लोग हैं कि जिन्हें आज़ादी की जरूरत है. किसान और मजदूर रोटी चाहते हैं और उनकी रोटी का सवाल तब तक हल नहीं हो सकता जब तक यहाँ पूर्ण आज़ादी न मिल जाए. वे गोलमेज कॉन्फ्रेंस या अन्य ऐसी किसी बात पर रुक नहीं सकते. खैर.
आजकल लिलुआ रेलवे वर्कशाप, टाटा की जमशेदपुर मिलों, जमशेदपुर शहर के भंगियों और बम्बई की कपड़ा-मिलों में हड़ताल हो गई है. वास्तव में तो मोटी-मोटी शिकायतें सबकी एक-सी होती हैं. वेतन कम, काम ज्यादा और व्यवहार बुरा. इस स्थिति में गरीब मजदूर जैसे-तैसे गुजारा करते हैं, लेकिन आखिर असहनीय हो जाता है. आज बम्बई में डेढ़-दो लाख व्यक्ति हड़ताल किए बैठे हैं. सिर्फ एक मिल चलती है. बात यह है कि नए हथकरघे आए हैं, जिनमें एक आदमी को दो हथकरघों पर काम करना पड़ता है और मेहनत ज्यादा करनी पड़ती है. यही काम करनेवालों का वेतन खासतौर से बढ़ाने, बाकी आम मजदूरों का वेतन बढ़ाने और 8 घंटे से अधिक काम न ले सकने और कुछ व्यवहार सम्बन्धी शर्तें पेश की गई हैं. इस समय हड़ताल का बड़ा जोर है. जमशेदपुर मिल के श्रमिकों की भी कुछ ऐसी ही माँगें हैं. वहाँ भी हड़ताल बढ़ती जा रही है. भंगी अपनी हड़ताल किए हुए हैं और शहर की नाक मंें दम हुआ है. सबसे अधिक सेवा करनेवाले भाइयों को हम भंगी-भंगी कहकर पास न फटकने दें और उनकी गरीबी का लाभ उठाकर थोड़े-से पैसे देकर काम कराते रहें और बेगार भी खूब घसीटें. खूब! आखिर उन्हें भी उठना ही था. वे तो लोगों को, विशेषतः शहरों में, दो दिन में सीधे रास्ते पर ला सकते हैं. उनका उठना बड़ी खुशी की बात है. लिलुआ वर्कशाप से कुछ आदमी निकाल दिए गए थे और वेतन के भी कुछ झंझट थे, इसलिए हड़ताल हो गई. बाद में ऐलान हो गया कि कई हजार व्यक्तियों का काम बिलकुल ही बन्द कर दिया जाएगा और हड़ताल खत्म होने पर भी उन्हें काम में नहीं लिया जाएगा. इससे बड़ी सनसनी फैली. लेकिन हड़ताल जोरों पर है. श्री स्प्रैट आदि सज्जन खूब काम कर रहे हैं. लोगों को चाहिए कि वे उनकी हर तरह से सहायता करें और उनकी हड़ताल तुड़वाने की जो तैयारी हो रही है, वह बन्द कराई जाए. हम चाहते हैं कि सभी किसान और मजदूर संगठित हों और अपने अधिकारों के लिए यत्न करें.

साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज
[1919 के जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों का खूब प्रचार शुरू किया. इसके असर से 1924 में कोहाट में बहुत ही अमानवीय ढंग से हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए. इसके बाद राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस चली. इन्हें समाप्त करने की जरूरत तो सबने महसूस की, लेकिन कांग्रेसी नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम नेताओं में सुलहनामा लिखाकर दंगों को रोकने के यत्न किए.

जैसा कि पीछे कहा गया है, इस समस्या के निश्चित हल के लिए क्रान्तिकारी आन्दोलन ने अपने विचार प्रस्तुत किए. प्रस्तुत लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में छपा. यह लेख इस समस्या पर शहीद भगत सिंह और उनके साथियों के विचारों का सार है. -सं.]

भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है. एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं. अब तो एक धर्म के होना ही दूसरे धर्म के कट्टर शत्रु होना है. यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें. किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिन्दुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है. यह मार-काट इसलिए नहीं की गई कि फलाँ आदमी दोषी है, वरन् इसलिए कि फलाँ आदमी हिन्दू है या सिख है या मुसलमान है. बस किसी व्यक्ति का सिख या हिन्दू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था. जब स्थिति ऐसी हो तो हिन्दुस्तान का ईश्वर ही मालिक है.

ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नज़र आता है. इन ‘धर्मों’ ने हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है. और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे. इन दंगों ने संसार की नज़रों में भारत को बदनाम कर दिया है. और हमने देखा है कि इन अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं. कोई विरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठंडा रखता है, बाकी सबके सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रोब को कायम रखने के लिए डंडे-लाठियाँ, तलवारें-छुरे हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सर फोड़-फोड़कर मर जाते हैं. बाकी बचे कुछ तो फाँसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिए जाते हैं. इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर अंग्रेजी सरकार का डंडा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने पर आ जाता है.

जहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अख़बारों का हाथ है. इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली. वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्र कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज-स्वराज’ के दमगज़े मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाए चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव मेें बह चले हैं. सिर छिपाकर बैठनेवालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, वैसे तो जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं. जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं, और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आई हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे. ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है.

दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, वे अख़बारवाले हैं.
पत्रकारिता का व्यवसाय, जो किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था, आज बहुत ही गन्दा हो गया है. यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर-फुटौवल करवाते हैं. एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अख़बारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं. ऐसे लेखक, जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो, बहुत कम हैं.

अख़बारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था; लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है. यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आँखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति देख रोना आता है. कहाँ थे वे दिन कि स्वतन्त्रता की झलक सामने दिखाई देती थी और कहाँ आज यह दिन कि स्वराज्य का सपना मात्र बन गया है. बस यही तीसरा लाभ है, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है. वही नौकरशाहीदृजिसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया था, कि आज गई, कल गईदृआज अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर चुकी है कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है.

यदि इन साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है. असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्रकारों ने ढेरों कुर्बानियाँ दीं. उनकी आर्थिक दशा बिगड़ गई थी. असहयोग आन्दोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर अविश्वास-सा हो गया, जिससे आजकल के बहुत-से साम्प्रदायिक नेताओं के धन्धे चौपट हो गए. विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है. कार्ल मार्क्स के तीन बड़े सिद्धान्तों में से यह एक मुख्य सिद्धान्त है. इसी सिद्धान्त के कारण ही तबलीग, तनकीम, शुद्धि आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है.

बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है, क्योंकि भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी खराब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है. भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धान्त ताक पर रख देता है. सच है, मरता क्या न करता.

लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होना अत्यन्त कठिन है क्योंकि सरकार विदेशी है और यही लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती. इसीलिए लोगों को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिए और जब तक सरकार बदल न जाए, चैन की साँस न लेना चाहिए.

लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है. गरीब मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए. संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं. तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो. इन यत्नों में तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जाएँगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी.

जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि जार के समय वहाँ भी ऐसी ही स्थितियाँ थीं, वहाँ भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूत-पतांग करते रहते थे. लेकिन जिस दिन से वहाँ श्रमिक-शासन हुआ है, वहाँ नक्शा ही बदल गया है. अब वहाँ कभी दंगे नहीं हुए. अब वहाँ सभी को ‘इनसान’ समझा जाता है, ‘धर्मजन’ नहीं. जार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब थी, इसलिए सब दंगे-फसाद होते थे. लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गई है और उनमें वर्ग-चेतना आ गई है, इसलिए अब वहाँ से कभी किसी दंगे की खबर नहीं आई.

इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन कलकत्ते के दंगों में एक बात बहुत खुशी की सुनने में आई. वह यह कि वहाँ दंगों में ट्रेड यूनियनों के मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन् सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे. यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे. वर्ग-चेतना का यही सुन्दर रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है.

यह खुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब वैसे धर्मों से जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे हैं और उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नज़र सेदृहिन्दू, मुसलमान या सिख-रूप में नहीं, वरन् सभी को पहले इनसान समझते हैं, फिर भारतवासी. भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहला है और भारतवासियों को इन दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए, बल्कि तैयार-बर-तैयार हो यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने, ताकि दंगे हों ही नहीं.

1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था. वे समझते हैं कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है, इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं. न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए, क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता. इसीलिए गदर पार्टी-जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फाँसियों पर चढ़े और हिन्दू-मुसलमान भी पीछे नहीं रहे.
इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान मंें उतरे हैं, जो धर्म को राजनीति से अलग करना चाहते हैं. झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुन्दर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं.

यदि धर्म को अलग कर दिया जाए तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते हैं. धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें.
हमारा ख़याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताए इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमें बचा लेंगे.

• पुस्तक – भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज
• संपादक – जगमोहन सिंह , चमन लाल
• प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन
• एएसआईएन : B0753D6GBT
• प्रकाशन वर्ष – 2014
• भाषा – हिंदी
• पृष्ठ – 473

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