बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद राज्यों के क्षत्रपों को परास्त करना होगी BJP की आगे की रणनीति

नई दिल्ली. पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी विधानसभा चुनाव के नतीजों ने देश के क्षेत्रीय क्षत्रपों में एक नई उम्मीदें जगाई हैं. राष्ट्रीय राजनीति को देखते हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Results 2021) के नतीजे गैर बीजेपी (BJP) और गैर कांग्रेस (Congress) गठबंधन के लिए नई उम्मीदें ले कर आया है. पिछले सात सालों में देश के अंदर इस तरह का राजनीतिक माहौल पहले कभी नहीं देखा गया, जितना बंगाल चुनाव में टीएमसी (TMC) की जीत के बाद अब देखी जा रही है. बंगाल जीत के बाद मोदी (PM Modi) विरोध की राजनीति करने वाले राजनीतिक पार्टियां काफी खुश नजर आ रही हैं. हालांकि, बीजेपी नेताओं का कहना है कि उन्होंने बंगाल में बीजेपी को 3 से 77 सीट तक पहुंचाया है. इसके बावजूद सवाल उठना लाजिमी है कि जो बीजेपी राज्य में सरकार बनाने का ही नहीं 200 पार का दावा कर रही थी, उससे कहां चूक हुई? ऐसे में यह भी सवाल उठेंगे कि जिस बीजेपी का स्ट्राइक रेट राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में तो बढ़िया रहता है, वही बीजेपी जब अकेले हरियाणा, बिहार, तमिलानाडु, महाराष्ट्र, पं बंगाल, ओड़िशा और असम में लड़ती है तो स्थितियां क्यों बदल जाती है? मोदी मैजिक का असर 2024 तक रहेगा? ऐसे में क्या मोदी मैजिक क्षेत्रीय क्षत्रपों के गढ़ में ध्वस्त होता जा रहा है? मोदी और अमित शाह जैसा स्टार प्रचारक और बेहतर रणनीतिकार के बावजूद बीजेपी क्यों रीजनल पार्टियों के आगे नतमस्तक होती जा रही है? हरियाणा, बिहार, यूपी, तमिलानाडु, महाराष्ट्र, पं बंगाल, ओड़िशा और असम में रीजनल पार्टियों का काफी मजबूत हैं. ऐसे में देश में रीजनल पार्टियां और उसके किले में बीजेपी का ध्वस्त होने के मायने क्या होंगे और इसके राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर क्या दूरगामी असर पडे़गा?

नरेंद्र मोदी और अमित शाह. (पीटीआई फाइल फोटो)

बीजेपी भविष्य की राजनीति पर क्यों फोकस कर रही है? बीजेपी नेताओं के द्वारा अक्सर कहा जाता है कि बीजेपी भविष्य की राजनीति करती है. यह हाल के वर्षों में बीजेपी की रणनीति देखकर भी लगता है. बंगाल विधानसभा चुनाव जीतने की रणनीति भी साल 2018 से बनाई जा रही थी. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में इसके अच्छे नतीजे भी सामने आए थे, जब बीजेपी ने 18 लोकसभा सीट जीत कर सबको हैरान कर दिया था. लेकिन, 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी 2019 वाला जलवा बरकरार नहीं रख सकी. हालांकि, साल 2016 में जो पार्टी 3 सीट लाई थी वह वह इस बार 77 तक जरूर पहुंच गई है. क्षेत्रीय दलों से कैसे पार पाएगी बीजेपी
जानकार बताते हैं कि बीजेपी का इतिहास रहा है कि जहां मुख्य मुकाबला क्षेत्रीय पार्टियों से होता है (यूपी को छोड़ दें) वहां कमजोर साबित होती है. हालांकि, कई राज्यों में बीजेपी क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर कांग्रेस या दूसरी रीजनल पार्टियों को हराती भी रही है. महाराष्ट्र, बिहार, असम, हरियाणा, नार्थ-ईस्ट के कई राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों में बीजेपी रीजनल पार्टियों के साथ गठबंधन कर जीत दर्ज करती आ रही है. ताजा उदाहरण महाराष्ट्र का है जहां पर बीजेपी और शिवसेना साथ-साथ चुनाव लड़ी, लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद शिवसेना ने बीजेपी को झटका दे कर कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन कर लिया.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव

रीजनल पार्टियां क्यों बनती जा रही बीजेपी के लिए सिरदर्द ऐसे में जानकार मान रहे हैं कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव और 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम का असर कमोबेश दिखेगा. ऐसे बीजेपी के पास क्या विकल्प होंगे? साल 2014 में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की प्रचंड जीत के बाद अगले ही साल लालू-नीतीश की जोड़ी ने बिहार में बीजेपी को धूल चटा दी थी. साल 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ हुए ओड़िशा विधानसभा चुनाव में बीजेडी के नवीन पटनायक ने भी यही कारनामा किया था. बंगाल चुनाव के नतीजे कितना दूरगामी? हालांकि, बीते सात सालों से केंद्र में सत्ता में रही बीजेपी दोबारा से असम में और पहली बार पुडुचेरी में सरकार बनाने जा रही है. बीजेपी के लिए ये राहत की बात है कि इस बार असम में उसका वोट प्रतिशत 3.7 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि पुडुचेरी में बीजेपी का वोट प्रतिशत 11.2 प्रतिशत बढ़ा है. पश्चिम बंगाल में बीजेपी इससे पहले कभी पैर नहीं जमा सकी थी, लेकिन इस बार के विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन बेहतर हुआ है.

PM Narendra Modi

पश्चिम बंगाल के सोनारपुर में आयोजित एक चुनावी रैली में जुल्फिकार अली से मिलते पीएम नरेंद्र मोदी.
(BJP4India/3 April 2021)

क्या कहते हैं राजनीतिक जानकार राजनीतिक विश्लेषक संजीव पांडेय कहते हैं, ‘बीजेपी के लिए असम में सत्ता में वापसी और पश्चिम बंगाल में उसके वोट प्रतिशत के बढ़ने का असर साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में कमोबेश पड़ सकता है. देश में रीजनल पार्टियां भी अब ताकतवर होगी इससे इनकार नहीं किया जा सकता. ममता बनर्जी की जीत से क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा बढ़ेगा, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसका कोई खास असर नहीं दिखेगा. इसका कारण है कि इन दलों में एकजुटता का अभाव है. अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, स्टालिन, विजयन की अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं. टीएमसी, डीएमके, सपा, शिवसेना, राजद, अकाली दल जैसे दलों का एक साथ आना मुश्किल है. इन क्षेत्रीय दलों के नेताओं का प्रभाव अपने-अपने राज्यों तक ही सीमित है.’ ये भी पढ़ें: बंगाल चुनाव परिणाम पर BJP का पलटवार, कहा- RJD मुंगेरी लाल के हसीन सपने न देखे, अपना घर बचाए पांडेय आगे कहते हैं, देश का नेतृत्व करने के लिए कार्यकर्ताओं की एक मजबूत टीम का होना जरूरी है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि ममता बनर्जी बंगाल में मजबूत हैं, लेकिन बगल से सटे राज्य झारखंड और बिहार में ममता की कोई लोकप्रियता नहीं है. इसके बावजूद मोदी विरोधी गुट में राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में ममता बनर्जी का कद बढ़ जाएगा. ममता बनर्जी की राजनीति शिखर पर जरूर है और वह राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव भी डालेंगी, लेकिन उनको यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उन्हीं के किले नंदीग्राम में बीजेपी ने धूल चटाई है. यह बीजेपी के लिए एक शुभ संकेत है. कुलमिलाकर बंगाल के चुनाव परिणामों का राष्ट्रीय स्तर पर खास प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि राज्य स्तरीय चुनाव में जनता राष्ट्रीय मुद्दों पर नहीं बल्कि राज्य स्तरीय मुद्दों पर वोट करती है.’

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