जब भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पूरे बनारस को अप्रैल फूल बनाया

एक अप्रैल को लोगों को मूर्ख बनाने के कई किस्से हैं. इन्हीं में कई रोचक किस्से हम यहां आपके लिए दे रहे हैं. एक बार 01 अप्रैल को भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा बनारस के लोगों को अप्रैल फूल बनाने का किस्सा भी काफी कहा जाता है. इसमें हिंदी के इस प्रसिद्ध साहित्यकार ने 01-02 नहीं बल्कि हजारों लोगों को अप्रैल फूल बना दिया था. वैसे अन्य देशों में 01 अप्रैल के दिन मूर्ख दिवस बनाने के अपने अपने किस्से हैं, जिसे हम साथ ही साझा कर रहे हैं.

हिंदी के प्रामाणिक भारत कोश के अनुसार, एक बार हिंदी के बड़े साहित्यकार और हास्य प्रेमी भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बनारस में एक अप्रैल को एक खास ढिंढोरा पिटवा दिया. जिसने इसे सुना वही हैरानी से भर गया. बहुत से लोगों को विश्वास हुआ और बहुतों को नहीं हुआ लेकिन हर किसी ने इस संदेश के बाद बनारस के घाटों की ओर जरूर किया कि वो एक खास और अनहोनी बात देख सकें.

भारतेंदु ने ये ढ़िंढोरा पिटवाया था कि 01 अप्रैल की शाम बनारस में अमुक वैज्ञानिक चंद्रमा और सूरज को धरती पर उतार कर दिखाएंगे. इसके शाम के लिए खास समय दिया गया था. नियत समय पर हजारों लाखों लोगों की भीड़ बनारस के घाटों पर इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए जमा होने लगी.

पूरा बनारस ही अप्रैल फूल बन गयालोग घंटों इस करिश्मे के इंतज़ार में बैठे रहे लेकिन वहां कोई वैज्ञानिक नहीं दिखायी दिया. दरअसल उस दिन 01 अप्रैल था. बनारस के लोग बड़ी संख्या में मूर्ख बनकर आ गए. बनारस में ये किस्सा अब भी एक अप्रैल के दिन सुनाया जाता है.

बनारस में 01 अप्रैल के दिन अक्सर भारतेंदु का शहर को ही अप्रैल फूल बना देने का किस्सा चर्चित रहता है.

अप्रैल फूल का राजा के सपने से जुड़ा किस्सा
बहुत पहले यूनान में मोक्सर नामक एक मजाकिया राजा था. एक दिन उसने सपने में देखा कि किसी चींटी ने उसे जिंदा निगल लिया है. सुबह जब वो उठा तो अपने इस सपने पर हंसने लगा. रानी ने हंसने का कारण पूछा तो उसने इसके बारे में बताया. सुन कर रानी भी हंसने लगी.
तभी एक ज्योतिष ने आकर कहा, महाराज इस स्वप्न का अर्थ है- आज का दिन आप हंसी-मजाक व ठिठोली के साथ व्यतीत करें. उस दिन अप्रैल महीने की पहली तारीख थी. बस तब से लगातार एक हंसी-मजाक भरा दिन हर वर्ष मनाया जाने लगा.

भोला किसान जो हंसोड़ बन गया
एक लोक कथा के अनुसार एक अप्सरा ने किसान से दोस्ती की. अप्सरा ने किसान से कहा- यदि तुम एक मटकी भर पानी एक ही सांस में पी जाओगे तो मैं तुम्हें वरदान दूंगी. मेहनतकश किसान ने तुरंत पानी से भरा मटका उठाया. पी गया. जब उसने वरदान वाली बात दोहराई तो अप्सरा बोली- ‘तुम बहुत भोले हो, आज से तुम्हें मैं ये वरदान देती हूं कि तुम अपनी चुटीली बातों से लोगों के बीच खूब हंसी-मजाक करोगे. उसके बाद किसान लोगों को खूब हंसने लगा. जिस दिन ये हंसने – हंसाने का काम शुरू हुआ, उसे हम मूर्ख दिवस के नाम से पुकारते हैं.

कोपेनहेगन में वर्ष 2001 में मेट्रो स्टेशन पर 01 अप्रैल के दिन इस प्रांक को बनाकर सार्वजनिक किया गया.

चीन का किस्सा
बहुत पहले चीन में सनन्ती नामक एक संत थे, जिनकी दाढ़ी ज़मीन तक लम्बी थी. एक दिन उनकी दाढ़ी में अचानक आग लग गई तो वे बचाओ-बचाओ कह कर उछलने लगे. उन्हें इस तरह उछलते देख कर बच्चे जोर-जोर से हंसने लगे. तभी संत ने कहा, मैं तो मर रहा हूं, लेकिन तुम आज के ही दिन खूब हंसोगे, इतना कह कर उन्होंने प्राण त्याग दिए.

सबसे सच्चा झूठ
स्पेन के राजा माउन्टो बेर थे. एक दिन उन्होंने घोषणा कराई कि जो सबसे सच्चा झूठ लिख कर लाएगा, उसे इनाम दिया जाएगा. प्रतियोगिता के दिन राजा के पास ‘सच्चा झूठ’ के हजारों खत पहुंचे, लेकिन राजा किसी से संतुष्ट नहीं हुआ. तभी उसके पास एक लड़की आई. उसने कहा, महाराज मैं गूंगी और अंधी हूं.’ सुन कर राजा चकराया और पूछा ‘क्या सबूत है कि तुम सचमुच अंधी हो, तब तेज-तर्रार किशोरी ने कहा, महल के सामने जो पेड़ लगा है, वह आपको तो दिखाई दे रहा है, लेकिन मुझे नहीं.’ इस बात पर राजा खूब हंसा.

01 अप्रैल 1857 में जब लंदन में ये प्रचार हुआ कि उस दिन लंदन टावर में शेरों को नहलाए जाने का प्रदर्शन होगा तो बड़ी संख्या में लोग टिकट लेकर उसे देखने पहुंचे. दरअसल ये प्रांक था. यानि लोग अप्रैल फूल बन गए.

उसने किशोरी के इस सच्चे झूठ को बेस्ट माना. उसको इस परिहास का इनाम दिया. प्रजा के बीच घोषणा करवाई कि अब हम हर वर्ष पहली अप्रैल को मूर्ख दिवस का दिन मनाएंगे.

एथेंस में कैसे शुरू हुई अप्रैल फूल की परंपरा
ईसा पूर्व एथेंस नगर में चार मित्र रहते थे. इनमें से एक अपने को बहुत बुद्धिमान समझता था. दूसरों को नीचा दिखाने में उसको बहुत मजा आता था. एक बार तीनों मित्रों ने मिल कर एक चाल सोची. उससे कहा कि कल रात में एक अनोखा सपना दिखायी दिया. सपने में हमने देखा कि एक देवी हमारे सामने खड़ी होकर कह रही है कि कल रात पहाड़ी की चोटी पर एक दिव्य ज्योति प्रकट होगी. मनचाहा वरदान देगी, इसलिए तुम अपने सभी मित्रों के साथ वहाँ ज़रूर आना.
अपने को बुद्धिमान समझने वाले उस मित्र ने उनकी बात पर विश्वास कर लिया. तय समय पर पहाड़ की चोटी पर पहुंच गया. साथ ही कुछ और लोग भी उसके साथ ये तमाशा देखने के लिए पहुंचे. ये बात बताने वाले तीनों मित्र छिप कर सब तमाशा देख रहे थे. धीरे धीरे भीड़ बढ़ने लगी. रात हो गई. आकाश में चन्द्रमा और तारे चमकने लगे. लेकिन उस दिव्य ज्योति के कहीं दर्शन नहीं हुए. न ही उसका नामोनिशान कहीं दिखा.
कहते हैं उस दिन 1 अप्रैल था बस फिर तो एथेंस में हर वर्ष मूर्ख बनाने की प्रथा चल पड़ी. बाद में धीरे-धीरे दूसरे देशों ने भी इसको अपना लिया. अपने जानने वाले चिर -परिचितों को 1 अप्रैल को मूर्ख बनाने लगे. इस तरह मूर्ख दिवस का जन्म हुआ.

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