कौन हैं बस्तर के गांधी, जिन्होंने CRPF जवान को छुड़ाने में मदद की?

बीजापुर में कोबरा कमांडो राकेश्वर सिंह मिन्हास को नक्सलियों के कब्जे से रिहा कराने में 90 बरस के स्वतंत्रता सेनानी धर्मपाल सैनी की बड़ी भूमिका मानी जा रही है. विनोबा भावे के शिष्य रहे सैनी को लोकहित के कामों के कारण बस्तर का गांधी भी कहा जाता है. साथ ही प्यार से स्थानीय लोग उन्हें ताऊजी भी कहते हैं.

इस तरह से आए सुर्खियों में 
बीजापुर में 3 अप्रैल को नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़ में सुरक्षा बल के 22 जवान शहीद हुए थे. इसके बाद से ही सीआरपीएफ के कोबरा कमांडो राकेश्वर सिंह लापता थे. अगले दो दिनों बाद पता चला कि जवान नक्सलियों के कब्जे में है. इसके बाद से उसकी रिहाई के लिए मशक्कत चल रही थी. कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इसके लिए पहल की लेकिन उन्हें निराश लौटना पड़ा. इसी बीच धर्मपाल सैनी ने मध्यस्ता की और जवान अपने घर सुरक्षित लौट सका. इसके साथ ही सैनी लगातार चर्चा में हैं.

कोबरा कमांडो राकेश्वर सिंह मिन्हास सुरक्षित रिहा हो चुके हैं

खबर पढ़कर जुड़े बस्तर से 
धर्मपाल सैनी की कहानी बस्तर का गांधी बनने की शुरुआत साठ के दशक से शुरू होती है. उस दौरान उन्होंने बस्तर से जुड़ी एक खबर पढ़ी, जिसमें लड़कियों ने छेड़छाड़ करने वालों का जमकर मुकाबला किया था. खबर युवा सैनी के मन में घर कर गई. तब वे विनोबा भावे के शिष्य हुआ करते थे. सैनी के मन में लगातार आ रहा था कि बस्तर के युवा बेहद बहादुर हैं और उनकी ऊर्जा को सही दिशा देने की जरूरत है. इसी बात को सोचते हुए उन्होंने अपने गुरु से बस्तर जाने की इजाजत मांगी.

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गुरु ने इस शर्त पर दी इजाजत 
कहा जाता है कि विनोबा भावे ने उन्हें इस शर्त पर अनुमति दी थी कि वे अगले 10 सालों तक बस्तर से कहीं नहीं हिलेंगे. तब तक 10 साल बीत चुके थे. बता दें कि बस्तर में सुविधाओं का अभाव कई लोगों को उसे छोड़ने पर मजबूर करता रहा है. हालांकि सैनी के साथ इससे एकदम अलग हुआ. वे न केवल बस्तर में रहे, बल्कि वहीं के होकर रह गए.

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पद्मश्री धर्मपाल सैनी भूदान आंदोलन के जनक विनोबा भावे के शिष्य रह चुके हैं

खेलने की देने लगे ट्रेनिंग 
मध्यप्रदेश के धार जिले के धर्मपाल सैनी ने आगरा यूनिवर्सिटी से कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया था और शानदार एथलीट हुआ करते थे. शारीरिक वर्जिश में उन्हें खूब दिलचस्पी थी. बस्तर आने पर उन्होंने पाया कि यहां छोटे बच्चे भी कई किलोमीटर तक बगैर थके चलते हैं. बस्तर के युवा लगातार काम करने के बाद भी कभी शिकायत नहीं करते. ये सारी खूबियां देखते हुए धर्मपाल सैनी का एथलीट मस्तिष्क उन्हें बस्तर के लोगों की एनर्जी को दिशा देने की ओर ले गया. वे बच्चों को खेलने के लिए ट्रेनिंग देने लगे.

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लगातार जीत रही हैं इनाम 
साल 1985 में पहली बार उनके आश्रम की बच्चियां स्पोर्ट्स कंपीटिशन में औपचारिक तौर पर आईं. इसके बाद तो कतार ही लग गई. सालाना 100 स्टूडेंट्स अलग-अलग इवेंट में हिस्सा लेती और जीतती हैं. इसी से कोई हैरानी नहीं कि बच्चे एक के बाद एक लगातार खेल से जुड़ी ट्रॉफियां जीतने लगे. धर्मपाल सैनी के जगदलपुर स्थित डिमरापाल आश्रम में हजारों मैडल्स और ट्रॉफियां बच्चों समेत उनके गुरु की मेहनत का नतीजा हैं. 90 बरस की उम्र पार कर लेने के बाद भी धर्मपाल सैनी बेहद एक्टिव हैं और खुद ही स्पोर्ट्स में हिस्सा लेने वाली छात्राओं की ट्रेनिंग और डाइट का ख्याल रखते हैं.

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बस्तर में शिक्षा की अलख जगाने के पीछे धर्मपाल सैनी की प्रेरणा काम करती है- सांकेतिक फोटो (flickr)

इस वजह से मिला पद्मश्री सम्मान 
सैनी के आने से पहले तक बस्तर में साक्षरता का ग्राफ 10 प्रतिशत भी नहीं था. जनवरी 2018 में ये बढ़कर 53 प्रतिशत हो गया, जबकि आसपास के आदिवासी इलाकों का साक्षरता ग्राफ अब भी काफी पीछे है. बस्तर में शिक्षा की अलख जगाने के पीछे भी धर्मपाल सैनी की प्रेरणा काम करती है. उन के बस्तर आने से पहले तक आदिवासी लड़कियां स्कूल नहीं जाती थीं, वहीं आज बहुत सी पूर्व छात्राएं अहम प्रशासनिक पदों पर काम कर रही हैं. बालिका शिक्षा में इसी योगदान के लिए धर्मपाल सैनी को साल 1992 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया.

पद्मश्री के अलावा कई सम्मान उनके खाते में लगातार आते रहे. साल 2012 में द वीक मैगजीन ने सैनी को मैन ऑफ द इयर चुना था. अब कोबरा कमांडो की इतने विपरीत हालातों में सुरक्षित रिहाई करवा पाना भी बताता है कि धर्मपाल सैनी की पैठ और मान्यता केवल बस्तर के घरों में नहीं, बल्कि नक्सली भी उन्हें सम्मान देते हैं.

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